भास्कर न्यूज नेटवर्क.1989 में हुए लोकसभा चुनाव के करीब 16 महीने बाद एक बार फिर 1991 में चुनाव हुए। यह देश के इतिहास में तीसरा मध्यावधि चुनाव था। वीपी सिंह और चंद्रशेखर की सरकारें जल्द ही गिर गईं। पूरा चुनाव दो ही मुद्दों के इर्द-गिर्द लड़ा गया। पहला-मंडल आयोग की सिफारिशें और दूसरा-राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद। इसी के चलते इसे मंडल-कमंडल का चुनाव भी कहा गया।
सुरक्षा कारणों से पंजाब में चुनाव 1992 में कराए गए, जबकि जम्मू-कश्मीर में 10वीं लोकसभा के चुनाव कराए ही नहीं गए। चुनावों के दौरान एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना पहले दौर के मतदान के एक दिन बाद यानी 21 मई को हुई। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की लिट्टे द्वारा तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में चुनाव प्रचार के दौरान हत्या कर दी गई। खबर मिलते ही मुख्य निर्वाचन आयुक्त टीएन शेषन ने तयशुदा कार्यक्रम में बदलाव कर चुनाव को 15 दिन के लिए टाल दिया।
प्रधानमंत्री चंद्रशेखर सहित पूरी सरकार को भी यह खबर समाचार माध्यमों से मिली। चंद्रशेखर के कहने पर कैबिनेट सचिव ने शेषन से जवाब मांगा तो शेषन ने उन्हें उनकी हद और चुनाव आयोग के अधिकार बता दिए। इन चुनावों में करीब 57 फीसदी मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया। पहली बार ये चुनाव मई-जून की भीषण गर्मियों में हुए। पहले चरण के बाद राजीव गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति लहर का फायदा कांग्रेस पार्टी को हुआ। उसे 232 सीटें मिलीं और करीब डेढ़ वर्ष बाद एक बार फिर वह सत्ता में लौटी। 120 सीटों के साथ भाजपा दूसरे स्थान पर रही। जनता दल 59 सीटों के साथ तीसरे स्थान पर रहा।
लोकसभा सीटें जिन पर चुनाव हुए :521
कुल मतदाता :49.83 करोड़
मतदान प्रतिशत :56.73 %
कांग्रेस ने जीतीं :232 सीटें
भारतीय जनता पार्टी को मिलीं :120 सीटें
नई दिल्ली सीट पर राजेश खन्ना से हारते-हारते बचे आडवाणी
- प्रधानमंत्री पद के बड़े दावेदार एनडी तिवारी नैनीताल सीट से करीब 11 हजार वोट से हार गए। इसके बाद कांग्रेस संसदीय दल ने पीवी नरसिंह राव को प्रधानमंत्री चुना। राव ने 1991 का चुनाव नहीं लड़ा था। इसी साल उपचुनाव में आंध्रप्रदेश की नांदयाल सीट से वे लगभग पौने छह लाख वोटों से जीते।
- 1991 के चुनाव में त्रिपुरा पश्चिम से चुनाव लड़ने वाले संतोष मोहन देव सबसे ज्यादा 4.28 लाख मतों के अंतर से जीते थे। वहीं जनता दल के राम अवध सबसे कम 156 मतों से जीते।
- नई दिल्ली संसदीय सीट से आडवाणी खुद चुनाव हारते-हारते बचे। उनके खिलाफ कांग्रेस ने सुपर स्टार राजेश खन्ना को मैदान में उतारा था। आडवाणी प्रचार के लिए देशभर में घूमते रहे, वहीं राजेश खन्ना ने नई दिल्ली की गली-गली घूमी और वोट मांगा। राजेश खन्ना ने गिनती में जल्द ही बढ़त पा ली। आखिरी दौर की गणना में भी आडवाणी पिछड़े, तो राजेश खन्ना के समर्थक जीत का जश्न मनाने लगे। बढ़त का अंतर कम था। एेसे में कुछ कांग्रेसी नेताओं के कहने पर खन्ना ने दोबारा मतपत्रों की गिनती करवाई। दोबारा हुई गणना में आडवाणी ने राजेश खन्ना को करीब डेढ़ हजार मतों से हरा दिया। आडवाणी गांधीनगर सीट से भी जीते।
- भाजपा से अटलबिहारी वाजपेयी विदिशा और लखनऊ सीट से एक साथ लड़े और दोनों जगह से जीते। बाद में उन्होंने विदिशा सीट छोड़ दी।
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