मुंबई. आरबीआई को अपने रिजर्व फंड में कितना पैसा रखना चाहिए और सरकार को कितनी रकम डिविडेंड के रूप में देनी चाहिए, यह तय करने के लिए समिति बना दी गई है। रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर बिमल जालान इस समिति के अध्यक्ष हैं। पूर्व डिप्टी गवर्नर राकेश मोहन इसके उपाध्यक्ष होंगे। इनके अलावा चार और सदस्य होंगे। एक बयान में रिजर्व बैंक ने यह जानकारी दी है।
समिति अपनी पहली बैठक से 90 दिनों के भीतर रिपोर्ट देगी। इसे दूसरे देशों के केंद्रीय बैंकों का अध्ययन करने को भी कहा गया है। इसके बाद समिति बताएगी कि आरबीआई के रिजर्व फंड में जरूरत से ज्यादा रकम है या नहीं।
आरबीआई के पूर्व गवर्नर उर्जित पटेल और सरकार के बीच इस मुद्दे पर पिछले दिनों टकराव की स्थिति बन गई थी। आरबीआई के फंड में 9.6 लाख करोड़ रुपए हैं। यह आरबीआई के कुल एसेट का 28% है। सरकार का कहना है कि दूसरे बड़े देशों के केंद्रीय बैंक अपने एसेट का 14% रिजर्व फंड में रखते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर रिजर्व बैंक ने ग्लोबल मानकों के हिसाब से रिजर्व पूंजी घटाई तो उसे सरकार को करीब 3.5 लाख करोड़ रुपए देने पड़ेंगे।
रिजर्व फंड के विवाद की वजह से उर्जित पटेल ने गवर्नर पद से इस्तीफा दे दिया था। उनके इस्तीफे से पहले 19 नवंबर को आरबीआई की बोर्ड मीटिंग हुई थी। इसमें रिजर्व फंड तय करने के लिए समिति बनाने का फैसला हुआ था। सूत्रों के मुताबिक सरकार और रिजर्व बैंक में इस बात को लेकर विवाद था कि समिति का अध्यक्ष कौन हो।
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जालान के साथ समिति में 5 और सदस्य होंगे
- राकेश मोहन, पूर्व डिप्टी गवर्नर और पूर्व सचिव, वित्त मंत्रालय
- भरत दोशी, डायरेक्टर, सेंट्रल बोर्ड, आरबीआई
- सुधीर मांकड़, डायरेक्टर, सेंट्रल बोर्ड, आरबीआई
- सुभाष चंद्र गर्ग, आर्थिक मामलों के सचिव
- एन.एस. विश्वनाथन, डिप्टी गवर्नर, आरबीआई
आरबीआई का रिजर्व फंड तय करने के लिए पहले भी तीन समितियां बनी थीं- वी सुब्रमण्यम (1997), उषा थोराट (2004) और वाई.एस. मालेगाम (2013) समिति। सुब्रमण्यम समिति ने 12% और थोराट समिति ने 18% रिजर्व की सिफारिश की थी।
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