पटना. ए उमर अगर दम है तो कर दे इतनी खता, बचपन तो छीन लिया, बचपना छीन के दिखा। यह खुद का दिया हुआ परिचय है आज से 82 साल पहले दीना गांव (अब पाकिस्तान) में जन्मे गुलजार का, जिन्होंने श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में बुधवार को जब रचनाओं का संदूक खोला तो शायरी गुलजार हो गई। उनकी नज्मों में उनकी परिधि बुदबुदाती रही, ख्वाब गुनगुनाते रहे। संवेदना की इसी जमीन ने गुलजार को गुलजार साबित कर दिया। उनकी कलम से निकले अनगिनत शब्द कहीं न कहीं किसी न किसी किताब में पनाह पा चुके हैं, लेकिन उनकी नज्में उन्हीं के शब्दों में सुनने का मौका मिला तो लोग भी नहीं चूके।
मेरी फिल्मों में इस तरह हाॅल नहीं भरा, जैसा आज भरा
गुलजार बोले- अरसे बाद पटना आया हूं। जब भी आवाज आएगी मैं हाजिर हो जाउंगा। मेरी फिल्मों में इस तरह हाॅल नहीं भरा जैसा आज भरा है। यकीन मानिए इस तरह की महफिल मुझे पहली बार मिली है और इस तरह के सुनने वाले। ऐसे स्रोता नहीं मिलते किसी शायर को। मिल जाएं तो क्या कहना! बहुत-बहुत शुक्रिया। हिन्दी- ऊर्दू का दोआबा एक साथ यानी हिन्दुस्तानी जुबान के संगम पर खड़े गुलजार ने लरजती आवाज में जब नज्में सुनानी शुरू की तो दो घंटे तक स्रोता मंत्रमुग्ध हो बस उन्हें सुनते रहे। उनकी नज्मों का कैनवास अनगिनत सिलवटों में लिपटा हुआ न जाने कितनी अनजान खिड़कियां खोलता रहा। उनके लिखे-कहे में जिंदगी से जुड़े एहसास लोगों के दिलों में गहरे उतरते रहे। गुलजार को बखूबी मालूम है कि यदि प्रेम होगा तो उससे जुड़ी तमाम अच्छी-बुरी चीजें भी साथ-साथ होंगी। यही अनुभूतियां औरदिल छू लेने वाले शब्दों के इस्तेमाल से जज्बातों को सामने रखना ही गुलजार है।
मैं नज़्में ओढ़ कर बैठा हुआ हूं,
ठिठुरने लगता हूं,
कोना उठता है कोई जब कहीं से,
किसी मिसरे के अंदर झांक कर छूता है कोई,
मेरे नंगे बदन पर कपकपी दौड़ जाती है।
अपनी इस नज़्म से बुधवार की शाम उर्दू अदब की शान गुलज़ार ने जब अपना तआरुफ़ कराया कराया तो श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में मौजूद हर आम-ओ-खास तालियों की गड़गड़ाहट से उनका इस्तकबाल करता नजर आया। दैनिक भास्कर की ओर से आयोजित कार्यक्रम "एक शाम गुलज़ार" में उन्हें सुनने के लिए हजारों की तादाद में लोग पहुंचे थे। दैनिक भास्कर पटना उत्सव के प्रस्तुतकर्ता रजनीगंधा और सह प्रायोजक आस्तिक ग्रुप हैं।
भास्कर को दी दुआएं
गुलज़ार के साथ मंच पर बातचीत हिन्दुस्तान के मशहूर थियेटर निर्देशक सलीम आरिफ कर रहे थे। सलीम ने जब उनका स्वागत किया तो उन्होंने सबसे पहले दैनिक भास्कर को दुआएं दीं। कहा, मेरी दुआएं दैनिक भास्कर के साथ है। दैनिक भास्कर की थीम है आर्ट एंड कल्चर और बेवजह नहीं है कि वह हिन्दुस्तान का नंबर एक अखबार है। सलीम आरिफ ने जब उनसे सवाल पूछा कि आप नज़्म के विषय कैसे चुनते हैं? वह क्या बात होती है जब आपको लगता है कि नज़्म कही जाए? इसके जवाब में गुलज़ार ने कहा कि सच यह है कि नज़्म कहना क्राफ्ट है। एक मीडियम है कहने का। विषय नज़्म की वजह से नहीं होता नज़्म विषय की वजह से होती है। जैसे हांडी को चूल्हें पर रखा है तो वह उबलेगा ही, मैं भी चूल्हे पर रखी हांडी हूं। अपनी बात कहने का मेरा मीडियम नज़्म है।
आपकी यादें, आपको कुरेदती हैं
सलीम ने फिर सवाल किया कि आप की नज़्म है- आओ फिर नज़्म कहें दर्द को याद करें... गुलज़ार ने इसे कुछ यूं कहा- ये नास्टेल्जिया है, आपकी यादें हैं जो आपको कुरेदती हैं। जब आप उसे बयांकरना चाहते हैं तो वह एक लकीर के रूप में सामने आती है। वह दर्द बार-बार मजबूर करता है नज़्म लिखने के लिए। उन्होंने बड़े ही खूबसूरत अंदाज में बताया कि नज़्म मुझे क्यों परेशान करती है। नज़्म से अपने जुड़ाव को उन्होंने अपने इन शब्दों में बयां किया - मैं नज़्में ओढ़ कर बैठा हुआ हूं.... इसके बाद नज़्में सुनाने का जो दौर शुरू हुआ वह अगले दो घंटे यानी करीब नौ बजे रात तक चलता रहा। उन्होंने अपनी नज़्मों में नेचर, मोहब्बत, इंसानी जज्बात, बुढ़ापा, अखबार, किताबों समेत कई विषयों को समेटा। किताबों को लेकर कहा- किताबें झांकती हैं बंद आलमारी के शीशों से, बड़ी हसरत से तकती हैं, महीनों अब मुलाकातें नहीं होती...।
गुलजार का रचना संसार
गुलजार के शब्दों में नज्म एक क्राफ्ट है। जिंदगी हर तरह से छूती है आपको। विषय, नज्म की वजह नहीं; नज्म, विषय की वजह से आती है। वह बोले-
चूल्हे की आग पर चढ़ी हांडी में खदकते पानी की भाप से जैसे ढक्कन फड़फड़ाते हैं वैसे ही मेरे अंदर विषय फड़फड़ाते हैं। जिंदगी छू के जहां-जहां से गई, दाग एक देकर वहां-वहां से गई। यादें, नस्ताल्जिया जमा होती है। कुरेदती है। आओ फिर नज्म कहें। फिर कोई दर्द सहला लें आंखें। फिर कोई नज्म कहें। मैं नज्में ओढ़कर बैठा हूं। ठिठुरने लगता हूं कोना कोई उठाता है जब कोई। बिना नज्मों के नंगा हूं अंदर से। बहुत सी चोटें हैं तस्वीरों में ढांप रखी हैं।... नंगे होकर जख्म दिखाया नहीं करते। वह क्या है जो उबलता रहता है मेरे अंदर, वो क्या है जो कुछ पिघलता रहता है मेरे अंदर। उभरता रहता है जिस्म पर कतरा-कतरा। पुरानी नज्मों को खोलने से कभी-कभी होती है एलर्जी, किसी पुराने ख्याल की धूल उड़के जाती है नाक में। झड़ी सी लगती है छींकें फिर कुछ नजला सा लग जाता है मुझे। कुछ नज्में अधूरी सी है, मसलन-कुएं में डोल डूबा और फिर ऊपर नहीं आया। गिरह ही खुल गई। लपक के मोड़ तक आया बस इक दरवाजा हिल रहा था... वो फिर बाहर नहीं आई। मदारी मुझको खुदा लगा जब छोटा था मैं, खुदा मुझे मदारी लगता है जब देखता हूं तमाशे उसके।
गुलजार के शब्दों में दर्द का एहसास ही उनका रचना संसार है।
जीवन :बचपन से चचेरे भाई-बहनों के साथ पला-बढ़ा। आपने पौधा लगाया वह भी बड़ा हो रहा है। वह भी आपके भाई जैसा ही है। आपके ही आंगन में लगा है। हमें पेड़ों की पोशाकों से पता चलता है कि बदलने वाला है मौसम। पगडंगी जब निकलती है, पेड़ों को लगता है यह आखिरी मौसम है जीने का, बस जी भरकर जी लो।
बूढ़ा-सा इक आम का पेड़
मोड़ पे देखा है वो बूढ़ा-सा इक आम का पेड़ कभी?
मेरा वाकिफ़ है बहुत सालों से, मैं जानता हूं
जब मैं छोटा था तो इक आम चुराने के लिए
परली दीवार से कंधों पे चढ़ा था उसके
जाने दुखती हुई किस शाख से मेरा पांव लगा
धाड़ से फेंक दिया था मुझे नीचे उसने
मैंने खुन्नस में बहुत फेंके थे पत्थर उस पर
जिंदगानी : नजरिया कोई बनाया हुआ है, ऐसा नहीं। उलटी हरकत करता तो पागलखाने भेज दिया गया होता। जब कोई बात छू गई, सब पढ़ा लिखा सामने आ जाता है। किताबें जरूरी हैं। इल्म दोहराता है। मजबूर करता है। लेकिन महसूस अलग ढंग से होता है। नया महसूस किया ही अपना इजहार होता है।
मकान की ऊपरी मंज़िल पर अब कोई नहीं रहता
वो कमरे बंद हैं कबसे
जो 24 सीढियां जो उन तक पहुंचती थी, अब ऊपर नहीं जाती
मकान की ऊपरी मंज़िल पर अब कोई नहीं रहता
वहां कमरों में, इतना याद है मुझको
खिलौने एक पुरानी टोकरी में भर के रखे थे
बहुत से तो उठाने, फेंकने, रखने में चूरा हो गए
जन्नत :कितना कूड़ा करता है पीपल आंगन में नज्म सुनाने के क्रम में गुलजार ने कहा- जन्नत है हिन्दुस्तान का ग्रामीण जीवन, उस सभ्यता को छोड़कर मत आना। नज्म में पेड़ पर चील, कौअे, फुदकती गिलहरी, चिड़ियों का घोसला और बुहारी (झाड़ू) के बिंब इसी ग्रामीण जीवन से थे।
मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है
सावन के कुछ भीगे-भीगे दिन रखे हैं
और मेरे इक खत में लिपटी राख पड़ी है
वो राख बुझा दो, मेरा वो सामान लौटा दो
पतझड़ में कुछ पत्तों के, गिरने की आहट
कानों में इक बार पहन के लौटाई थी
पतझड़ की वो शाख अभी तक कांप रही है
वो शाख गिरा दो, मेरा वो सामान लौटा दो
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