नवनीत गुर्जर. अप्रत्याशित तौर पर छत्तीसगढ़ और राजस्थान अब भाजपा से मुक्त हो चुके लग रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कांग्रेस मुक्त भारत का नारा इन दो राज्यों में उल्टा पड़ गया। रुझानों से राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार बनना निश्चित हो गया है। मध्यप्रदेश में जीत बॉर्डर पर दिख रही है, कभी कांग्रेस आगे हो जाती है, कभी भाजपा। लगता है मप्र में कांग्रेस जीत भी तो गुजरात की तरह जीतेगी। इस जीत-हार को प्रश्न-उत्तर में समझिए।
प्रश्न : ये क्यों हुआ?
उत्तर : सरकार से नाराजगी।
प्रश्न : कैसे?
उत्तर : इसे ऐसे देख सकते हैं कि तीनों राज्यों में अन्य दलों को 4 से 7 के बीच ही सीटें मिलती रही हैं। इस बार यह आंकड़ा 15 के करीब जा रहा है।
प्रश्न : इसका क्या मतलब?
उत्तर : जैसे छत्तीसगढ़ में जोगी और बसपा का गठबंधन कांग्रेस के ही परंपरागत वोट काटता, यह तय था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सरकार के प्रति नाराजगी इतनी ज्यादा थी कि लोगों ने भाजपा को वोट नहीं दिया, जहां जो विकल्प दिखा, वहां वोट दिया। जोगी-बसपा ने भी भाजपा से नाराज वोट हासिल किए।
प्रश्न : मतलब कांग्रेस को वोट देना मजबूरी थी?
उत्तर : बिल्कुल। लोग सरकार से नाराज थे। जहां कांग्रेस मजबूत दिखी, उसे वोट दे दिया। छत्तीसगढ़ में जोगी-बसपा, मध्यप्रदेश में बसपा और राजस्थान में अन्य को भी वोट दे दिया, पर भाजपा को नहीं। फिर भी केवल मध्यप्रदेश ही ऐसा राज्य है जहां भाजपा कांटे की टक्कर दे रही है और सरकार बनाने की स्थिति में भी दिखाई दे रही है।
राजस्थान में सियासत का खो-खो : रुझानों पर लक्ष्मी प्रसाद पंत का एनालिसिस
- खो-खो के खेल में खिलाड़ी बारी-बारी से जगह बदलते हैं। राजस्थान में भी हर पांच साल में सत्ता बदलती है। एक बार भाजपा आती है, एक बार कांग्रेस। सियासत का राजस्थान में यही खेल है। रुझानों में कांग्रेस 100 सीटों के करीब पहुंच गई है। 2013 में उसे महज 21 सीटें मिली थीं। ये रुझान और ये संकेत साफ बता रहे हैं और कांग्रेस सरकार बनाने की तैयारी में है।
- कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी जीत यही है कि इन नतीजों ने प्राणविहीन पार्टी में प्राण फूंक दिए हैं और उसकी भाग्य रेखा खुल गई है। अब नजर इस पर है मुख्यमंत्री कौन बनेगा? सचिन पायलट साढ़े चार साल में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हैं। उन्होंने पिछले उपचुनावों में कांग्रेस को जीत दिलाई है। वे सीएम बनने की दौड़ में सबसे आगे हैं। लेकिन कांग्रेस में आलाकमान में ही सारी चीजें तय करता है।
सत्ता विरोधी लहर का आकलन नहीं कर पाई भाजपा : मध्यप्रदेश के रुझानों पर शिव कुमार विवेक का एनालिसिस
- मध्यप्रदेश में पल पल बदलते रुझानों में अभी यह कहना कठिन है कि कौन बाजी मारेगा। कई सीटों पर उलटफेर हो रहा है। कुछ सीटों पर मामूली अंतर से बढ़त दिख रही है जो कभी भी पलट भी सकती है। भाजपा के कई मंत्री या तो पीछे चल रहे हैं या आगे आने के लिए कड़ी मशक्कत कर रहे हैं। रामपाल सिंह, नरोत्तम मिश्रा, दीपक जोशी, रुस्तम सिंह, लालसिंह आर्य व बालकृष्ण पाटीदार पीछे चल रहे हैं तो जयंत मलैया, व भूपेंद्र सिंह पीछे होने के बाद बमुश्किल मामूली अंतर से आगे आ गए हैं।
- इधर बड़े नेताओं के रिश्तेदार भी पीछे चल रहे है जिसका अर्थ है कि मतदाता ने नए चेहरों को तरजीह दी है। इसी तरह कैलाश विजयवर्गीय के बेटे आकाश चार राउंड के बाद अब आगे आ गए हैं जबकि गौरीशंकर शेजवार के बेटे मुदित पीछे हैं। विदिशा जैसे पुराने किले को कांग्रेस ने भेद दिया है वहीं जयभान सिंह पवैया जैसा नेता पिछड़ रहा है तो साफ है कि भाजपा ने सत्ता विरोधी लहर का अपने उम्मीदवारों के संदर्भ में ठीक से आकलन नहीं किया था।
- कांग्रेस सभी इलाकों में भाजपा से कमतर प्रदर्शन नहीं कर रही है। चंबल-ग्वालियर, विंध्य व महाकौशल में उसके बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद पहले ही थी, लेकिन वह मालवा व बुंदेलखंड में भी भाजपा को पीछे धकेल रही है। किसान आंदोलन के गढ़ मंदसौर-नीमच की सीटों पर भाजपा की पकड़ कायम है। मंदसौर, नीमच व मनासा में भाजपा आगे है।
- ग्वालियर-चंबल ने भाजपा को करारा झटका दिया है। दलित-सवर्ण आंदोलन का सबसे ज्यादा असर यहीं पड़ा था। शिवपुरी जिले में जहां 5 में से 4 सीटें कांग्रेस को जा रही हैं तो भिंड की पांच में एक सीट भी भाजपा को हासिल नहीं हो रही है। वहीं, दतिया की तीनों सीटें कांग्रेस का जा रही हैं।
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