मुंबई. कंपनियों के बॉन्ड में निवेश करने वाले म्यूचुअल फंड अपने पोर्टफोलियो में से खराब क्वालिटी के बांड को अलग कर सकते हैं। बाजार की भाषा में इसे साइड-पॉकेटिंग कहा जाता है। इससे फंड में निवेश करने वालों को यूनिट की अच्छी कीमत (एनएवी) मिलेगी। यूनिट बेचना भी आसान होगा। बुधवार को सेबी की बोर्ड मीटिंग में साइड-पॉकेटिंग की इजाजत देने का फैसला हुआ। आईएल एंड एफएस संकट के बाद फंड इसकी मांग कर रहे थे।
सेबी ने स्टार्टअप्स की लिस्टिंग के नियम भी आसान किए हैं। इससे इनके लिए फंड जुटाना आसान होगा। अभी स्टार्टअप के ऑफर में किसी भी निवेशक को कम से कम 10 लाख रुपए निवेश करना पड़ता है। इसे घटाकर 2 लाख किया गया है।
अब तक ऑफर का कम से कम 75% हिस्सा संस्थागत निवेशकों के लिए रखना जरूरी था। बाकी 25% गैर-संस्थागत निवेशकों के लिए था। अब किसी भी श्रेणी के निवेशकों के लिए कोई सीमा नहीं होगी।
किसी एक संस्थागत निवेशक को अधिकतम 10% शेयर बेचने की सीमा भी खत्म कर दी गई है। अब तक कम से कम 200 एलॉटी को शेयर आवंटित करने का नियम था। इसे घटाकर 50 किया गया है।
साइड पॉकेटिंग क्या है?
यह अकाउंटिंग का एक तरीका है। यह खास तौर से डेट यानी बॉन्ड और मनी मार्केट पोर्टफोलियो में होता है। इसमें असानी से खरीदे-बेचे जाने वाले (लिक्विड) और अच्छी क्वालिटी के एसेट को खराब क्वालिटी के एसेट से अलग किया जाता है। इन्हें तत्काल बेचना भी मुश्किल होता है।यह कैसे काम करता है?
म्यूचुअल फंड डेट स्कीम का पैसा कई कंपनियों के बांड में लगाते हैं। खराब एसेट को अलग करने के बाद पोर्टफोलियो में जो बॉन्ड बच जाएंगे, उनकी अलग एनएवी निकाली जाएगी।निवेशकों को क्या फायदा होगा?
उन्हें बेहतर एनएवी मिलेगा। अगर भविष्य में खराब क्वालिटी वाले बांड की वैल्यू बढ़ती है तो पुराने निवेशकों को लाभ होगा। निवेशकों के पैसे भी नहीं फंसते हैं। स्कीम में बाकी बचे बांड आसानी से बेचे जा सकते हैं, इसलिए निवेशक जब चाहें उससे निकल सकते हैं।इसकी जरूरत क्यों पड़ी?
आईएल एंड एफएस संकट के बाद इसकी जरूरत पड़ी। बहुत सी म्यूचुअल फंड कंपनियों ने इसके बांड में निवेश कर रखा था। कंपनी ने डिफॉल्ट किया तो इसके बांड की वैल्यू गिरने लगी। इससे म्यूचुअल फंड स्कीमों की एनएवी भी गिर गई।
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