जदयू के एनडीए में आने से असहज थे उपेंद्र कुशवाहा

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पटना.जुलाई, 2017 में एनडीए में जदयू के आने के बाद से ही उपेंद्र कुशवाहा असहज महसूस करने लगे थे। प्रदेश की राजनीति में वे खुद को नीतीश कुमार के सामने दिखने की कोशिश में जुटे हैं। वर्ष 2000 में कुशवाहा पहली बार विधानसभा का चुनाव जीते। वे तब नीतीश कुमार की पहली पसंद रहे।

2005 तक उपेंद्र विधायक व विधानसभा में उपनेता भी रहे। इस समय सुशील मोदी विपक्ष के नेता थे। मोदी के लोकसभा चुनाव जीतने के बाद जब 2004 में अवसर आया तो तमाम विरोध के बावजूद नीतीश कुमार ने उन्हें विपक्ष का नेता बनवाया। हालांकि, वर्ष 2005 में वे विधानसभा का चुनाव हार गए।

1985 में शुरू हुआ राजनीतिक सफर

उनका राजनीतिक सफर वर्ष 1985 में शुरू हुआ था। वे युवा लोकदल के महासचिव बने और 1988 तक इस पद पर रहे। फिर 1988 में राष्ट्रीय महासचिव बने और 1993 तक इस पद पर रहे। इस दौरान वे नीतीश कुमार के सबसे करीबी रहे। नीतीश कुमार के लव-कुश के बड़े किरदार रहे। उन्हीं की पहल पर 1994 में समता पार्टी के महासचिव, फिर प्रधान महासचिव बने। इसके पहले 2000 में पहली बार विधानसभा के लिए चुने गए। नीतीश कुमार की पहल पर 2004 में विधानसभा में विपक्ष के नेता बने। वर्ष 2007 में जदयू छोड़ा और 2008 में राष्ट्रवादी कांग्रेस में शामिल हुए, प्रदेश अध्यक्ष बने। 2009 में महात्मा फूले समता परिषद के बैनर तले फिर अलग राह पकड़ ली। 2010 में जदयू में गए और राज्यसभा सांसद बने। 2013 में जदयू छोड़कर राष्ट्रीय लोक समता पार्टी बनाई और 2014 में काराकाट से लोकसभा सदस्य बने। फिलहाल इसी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

अरुण, सुधांशु व ललन ने पकड़ ली अलग राह

उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी रालोसपा का विवादों से हमेशा साथ बना रहा। पार्टी बनी तो सांसद अरुण कुमार से उनकी तल्खी बढ़ी। अंत में अरुण कुमार ने अलग रास्ता अपना लिया। पार्टी के दोनों विधायक सुधांशु कुमार और ललन पासवान ने भी उपेंद्र कुशवाहा से अलग राह पकड़ ली। एकमात्र बचे सांसद राम कुमार शर्मा भी पार्टी में सहज नहीं थे। एनडीए छोड़ने के विचार से वे सहमत नहीं थे। उन्होंने खुलेआम नाराजगी प्रकट की। पर, उन्होंने कुशवाहा का साथ नहीं छोड़ा। हालांकि पार्टी के कई नेता उन्हें छोड़ गए।

अनदेखी का था डर

उपेंद्र कुशवाहा को एनडीए में अपनी अनदेखी का डर भी था। नीतीश कुमार के एनडीए में आने के बाद कुशवाहा को यह डर लगातार सताता रहा। भाजपा के लिए नीतीश कुमार का महत्व अधिक था। उनका सम्मान और स्थान भी किसी अन्य नेता की अपेक्षा अधिक था। ऐसे में कुशवाहा एनडीए में अपना घटता मूल्य स्पष्ट महसूस कर रहे थे। भाजपा के शीर्ष नेता भी नीतीश कुमार को बिहार में अपना नेता मानकर ही रणनीति बना रहे थे।



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Kushwaha was uncomfortable when JDU's came in NDA

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