केंद्र सरकार एक ओर 3,000 करोड़ रुपए खर्च करके और अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग कर चाइनीज 'स्टेच्यू ऑफ यूनिटी' स्थापित करती है,दूसरी ओर राज्यसभा में बयान देती है कि 2.14 लाख करोड़ रुपए का बैंकों का नॉन परफॉर्मिंग एसेट (एनपीए) यानी बट्टे खाते का कर्ज माफ कर दिया गया है, तीसरी ओर सरकार के मंत्री प्रेस कॉन्फ्रेंस में घोषणा करते हैं कि सरकार अपनी अंतरिक्ष संबंधी गगनयान योजना पर 10,000 करोड़ रुपए खर्च करेगी, चौथी ओर सरकार कह रही है कि गरीब सवर्णों को नौकरियों एवं शिक्षा में 10 फीसदी आरक्षण का संविधान संशोधन बिल लाएगी।
किंतु जब दलितों की बारी आई तो इस वर्ग के तीन लाख परिवारों से मांगकर भीम महासंगम में जमीन पर समरसता खिचड़ी खिलाकर बहला दिया।यह कैसा विरोधाभास है? यह कैसी विडम्बना है? सवर्ण समाज के गरीबों के उत्थान के लिए सरकारी नौकरी और दलितों के उत्थान के लिए केवल समरसता खिचड़ी। इतना ही नहीं सरकार 4200 करोड़ रुपए खर्च करके एक महीने के लिए आस्था का कुंभ मेला लगा रही है। क्या इस राशि को कम करके दलितों, किसानों एवं गरीबों के लिए नौकरियां सृजित करने में नहीं लगाया जा सकता था।
सभी वर्गों की युवा आबादी को आज नौकरियों की सख्त आवश्यकता है। सरकार ने संसद में एक अन्य बयान में यह भी बताया है कि 24 लाख पद आज भी रिक्त पड़े हैं परंतु सरकार उन्हें भरने के लिए कोई प्रयास नहीं कर रही है। अगर सरकार इन नौकरियों पर कुछ हजार करोड़ रुपए खर्च करती तो सभी समाजों के बेरोजगार नौजवानों को फायदा होता। यह स्वस्थ समाज की दिशा में रचनात्मक कदम होता। परंतु यह सरकार तो पॉलिटिकल स्टन्ट करने के लिए चुनावी वर्ष में दलितों को समरसता खिचड़ी खिला रही है।
यह कैसी सोच है, जब हमारा देश 21वीं सदी के कंप्यूटर युग में बहुराष्ट्रीय कंपनियों की कतार के साथ विश्व की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था होने का दावा कर रहा है, तब हम दलितों को समरसता का पाठ पढ़ाने के लिए उन्हीं के घरों से मांगी हुई खिचड़ी खिलाने का सार्वजनिक महासम्मेलन कर रहे हैं।
वह भी भीम महासंगम के नाम से। यानी बाबा साहेब आम्बेडकर को एक बार फिर संकुचित नज़रिये से परिभाषित कर उन्हें केवल दलितों का मसीहा घोषित किया गया, जबकि सभी जानते हैं कि बाबासाहेब ने समाज के सभी वर्गों के लिए कार्य किया। विशेषकर भारतीय महिलाओं के अधिकारों के लिए हिंदू कोड बिल लाकर उनकी लड़ाई लड़ी।
इतना ही नहीं बाबासाहेब ने राष्ट्रीय निर्माण हेतु संविधान के साथ अनेक संस्थाओं एवं योजनाओं के सृजन में अपना योगदान दिया। फिर उनको दलितों तक सीमित करना एक स्वस्थ परम्परा से परे है। यह संकीर्ण सोच बदलनी चाहिए।
सभी जानते हैं कि आज भूमंडलीकरण एवं सूचना क्रांति के इस युग में दलित समाज सत्ता, संसाधन, शिक्षा (तकनीकी, कंप्यूटरीकृत, प्रबंधन, उच्च शिक्षा) एवं स्वास्थ्य के क्षेत्र में अपनी हिस्सेदारी मांग रहा है। ऐसी परिस्थिति में उसे ज्यादा से ज्यादा स्कॉलरशिप चाहिए।
विदेशी विश्वविद्यालयों की डिग्री के लिए वजीफा चाहिए तो यूजीसी उसकी स्कॉलरशिप ही रोक रहा है। शिक्षण संस्थाओं विशेषकर स्नातक एवं स्नातकोत्तर विश्वविद्यालयों में दलितों के आरक्षण के साथ खिलवाड़ कर पहले उसे प्रभावहीन बनाने का प्रयास किया गया और बाद में उस पर रोक लगाकर उसे निष्प्रभावी कर दिया गया।
उत्तर भारत के लगभग डेढ़ सौ विश्वविद्यालयों में दलित समाज का एक भी वाइस चांसलर नहीं है। यहां तक कि बाबासाहेब आम्बेडकर केंद्रीय विश्वविद्यालय लखनऊ एवं आम्बेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली में कुलपतियों की नियुक्तियां कई वर्षों से लंबित हैं परंतु यहां किसी को नियुक्त ही नहीं किया जा रहा है।
आज गणतंत्र के 69वें वर्ष में दलित समाज आर्थिक एवं राजनीतिक निर्णयों में अपनी भागीदारी मांग रहा है। सार्वजनिक क्षेत्र की मुनाफा कमाती कंपनियां -जिनमें दलितों का अारक्षण था- उन्हें औने-पौने दामों में क्यों बेचा जा रहा है, वह इसे समझना चाहता है।
इस देश को गगनयान, बुलेट ट्रेन या नदियों पर लैंड करने वालों विमानों की आवश्यकता है, इस निर्णय में भागीदार बनकर वह भी देश के विकास की प्राथमिकता तय करना चाहता है। किंतु जब राष्ट्रीय व राज्यस्तर पर सरकार के मंत्रियों पर नज़र डालते हैं तो एक भी दलित नहीं दिखाई देता है, जिसके पास ऐसा मंत्रालय है जिसमें वह आर्थिक विकास व उत्थान की बात सोच सके।
यहां तक कि स्पेशल कम्पोनेंट प्लान के तहत जो दलितों के हिस्से का पैसा हर विभाग को अलग करना होता है उस पर भी दलित मंत्री अपनी सक्रियता नहीं दिखा सकते और न ही कोई प्रश्न पूछ सकते हैं। और तो और भारतीय जनता पार्टी की ओर से राष्ट्रीय टेलीविजन पर बहस में सरकार एवं राजनीतिक दल का पक्ष रखने के लिए दलित वर्ग का एक भी प्रवक्ता नहीं मिलेगा। यह तो दलितों के प्रतिनिधित्व की वास्तविकता है।
अत: ऐसी स्थिति में दलितों को यह लगता है कि समरसता के लिए दलितों के घरों से लाई गई खिचड़ी खिलाना उनका उपहास उड़ाना है। दलितों को यह लगता है कि उन्हें बार-बार यह एहसास कराया जाता है कि यद्यपि वे आज भी इस लायक नहीं है कि कोई सामान्य व्यक्ति उनके साथ भोजन करें पर भाजपा एवं संघ के लोग उनके साथ भोजन कर रहे हैं। ऐसा करके वे अपने आपको प्रगतिशील एवं सहिष्णु प्रमाणित करने का असफल प्रयास करते हैं।
लेकिन सोचने की बात है कि क्या ऐसे प्रतीकात्मक आयोजनों की वाकई कोई प्रासंगिकता है? हर बार दलितों के घर में या उनके साथ भोजन करते हुए तस्वीरों का समाचार-पत्रों में छपना या टीवी पर खबर का चलना इसी सोच को प्रमाणित करता है। सत्ता में बैठे लोग सामंतवादी सोच छोड़कर दलितों को सत्ता एवं संसाधन में भागीदार बनाएं। यह समरसता से नहीं संरचनात्मक परिवर्तन से होगा, जिसके लिए दलितों को अपना प्रतिनिधित्व चाहिए। लेखक - विवेक कुमार(ये लेखक के अपने विचार हैं)
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