आरबीआई के सरप्लस कैश रिजर्व से सरकार का कोई लेना-देना नहीं: चिदंबरम

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नई दिल्ली (हेमन्त अत्री). पूर्व वित्त मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी चिदंबरम के अनुसार आरबीआई के कैश रिजर्व को अतिरिक्त बताकर इस पैसे को लेना ठीक नहीं। इस सरप्लस से सरकार का कोई सरोकार नहीं है। बैंकों के नॉन परफॉर्मिंग एसेट (एनपीए) को लेकर उन्होंने मोदी सरकार को खुली चुनौती दी। कहा कि अगर सरकार में हिम्मत है तो 1999 से अलग-अलग सरकार के समय दिए गए कर्ज का वह आंकड़ा सार्वजनिक करे जो बाद में एनपीए बने। पूर्व वित्त मंत्री के अनुसार सरकार से कई बार मांग की गई, लेकिन उसने ये आंकड़े जारी नहीं किए। इससे साबित होता है कि बढ़ते एनपीए के लिए कांग्रेस नहीं, मोदी सरकार दोषी है। उन्होंने बीजेपी के इस आरोप को भी खारिज किया कि यूपीए के समय बैंकों पर ज्यादा कर्ज देने का दबाव था। उनसे बातचीत के प्रमुख अंश...

अर्थव्यवस्था मई 2014 की तुलना में कहां खड़ी है?
तब की तुलना में बेहद कमजोर है। राजकोषीय और करंट अकाउंट घाटा दबाव में है। रोजगार के अवसर घटे और बेरोजगारी बढ़ी है। कुल कर्ज में कुछ सुधार हुआ है लेकिन उद्योगों के लिए कर्ज की उपलब्धता महज 1.9% है। निर्यात में पिछड़ना जारी है। 31 मार्च 2014 को देश का मर्केंटाइल गुड्स का निर्यात 315 अरब डॉलर था। मौजूदा सरकार के आने के बाद यह कभी 310 अरब के पार नहीं गया।

मौजूदा सरकार के जीडीपी ग्रोथ पर क्या कहेंगे?
मेरी नजर में जीडीपी को लेकर सरकार के आंकड़े संदिग्ध हैं। इसका निर्धारण करने वाले सभी पैमानों में गिरावट है। इसलिए अर्थशास्त्री भी जीडीपी वृद्धि दर के सरकारी दावों को लेकर संशय में हैं।

एनपीए को लेकर सरकार की नीति कितनी सही है?
सरकार पूरी तरह विफल रही है। एमएसएमई के एनपीए बढ़ने के कारण अलग हैं। इसी तरह इस्पात, कोयला, टेलीकॉम के एनपीए बढ़ने का कारण नीतियों में बदलाव है। जान-बूझकर कर्ज नहीं लौटाने वाले विलफुल डिफॉल्टर भी हैं। विलफुल डिफॉल्टरों के साथ रियायत नहीं बरती जा सकती। मौजूदा सरकार ने समस्या के मूल में जाकर समाधान निकालने की बजाय सबको एक ही लाठी से हांकने का काम किया। परिणाम सामने हैं।

चिदंबरम ने कहा कि आरबीआई के कैश रिजर्व को अतिरिक्त बताकर इसे लेना ठीक नहीं है। आरबीआई के सरप्लस से सरकार का कोई सरोकार नहीं होता है। सरकार रिजर्व बैंक से केवल हर साल होने वाले मुनाफे की मांग कर सकती है। रिजर्व बैंक 2013-14 से उसे नियमित रूप से डिविडेंड के रूप में यह रकम दे रहा है।

नीतियों में निरंतर बदलाव से निवेश और विदेशी निवेशकों पर क्या असर हुआ है?
निवेश की दर कम है। नीतियों की अनिश्चितता से निवेशक चिंतित हैं। अनिश्चितता के कारण ही 2018 में उन्होंने पैसा बाहर निकाला है। इसमें भी कारणों का अलग-अलग क्षेत्र के हिसाब से विश्लेषण करने के बाद ही कुछ कहा जा सकता है।

कहा जा रहा है कि यूपीए के समय बैंकों पर ज्यादा कर्ज देने के दबाव था। बैंकों ने बिना पूरी छानबीन के कर्ज दिए जो एनपीए बन रहे हैं।
हमारी सरकार में बैंकों पर कोई दबाव नहीं था। बैंकों को ज्यादा कर्ज देने के निर्देश भी नहीं दिए गए थे।

किसान कर्ज माफी पर आपकी क्या राय है?
2008 में जब हमने कर्ज माफी की थी तो अंदाजा नहीं था कि कर्ज फिर इतना बढ़ जाएगा। पांच करोड़ किसान परिवारों पर 90 हजार से एक लाख रुपए का कर्ज है। इसलिए कर्ज माफ करना जरूरी है। मैं राहुल जी की बात से सहमत हूं।

मौजूदा आर्थिक हालात और संकट से पार पाने का कोई रोड मैप बताएंगे?
विपक्ष में बैठे व्यक्ति से यह पूछना सही नहीं। रोडमैप तभी बन सकता है जब हमारे पास वास्तविक हालात और आंकड़ों की सही व सटीक जानकारी हो। यह जानकारी सरकार में बैठे लोगों के पास रहती है।

मोदी सरकार के 3 सबसे खराब आर्थिक फैसले क्या हैं?
नोटबंदी, दोषपूर्ण जीएसटी का क्रियान्वयन और एनपीए की मिस-हैंडलिंग। नोटबंदी का लक्ष्य हासिल नहीं हुआ। जीएसटी में हमारा शुरू से ही अरविंद सुब्रमण्यम की सिफारिशों के अनुरूप टैक्स की मॉडरेट दर लागू करने पर जोर था, पर सरकार ने कई स्लैब और भारी-भरकम दरें लागू कर दीं। सरकार अब अपनी गलती की कीमत जनता पर थोपना चाह रही है।

आम चुनाव में कांग्रेस के लिए क्या संभावनाएं हैं?
पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव परिणामों से एक बात साफ है कि लोग सत्ता परिवर्तन के लिए तैयार हैं। कांग्रेस देश की सबसे पुरानी और मुख्य विपक्षी पार्टी है। हम जीत के लिए मैदान में उतरेंगे क्योंकि सत्ता परिवर्तन के बाद सरकार बनाने के सबसे गंभीर दावेदार हैं। इसके लिए दूसरे दल हमारे साथ आना चाहेंगे तो हमें उनका साथ स्वीकार होगा।

2004 की अटल सरकार और 2014 की मोदी सरकार में से किसे चुनौती देना ज्यादा कठिन है?
दोनों परिस्थितियों में कुछ समानताएं हैं, तो कुछ अंतर भी। तब कांग्रेस के सामने अटल जी जैसा कद्दावर नेता था और उनकी सरकार के कामों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने वाला इंडिया शाइनिंग अभियान था। मौजूदा सरकार के पास उपलब्धियों के नाम पर ढोल पीटने के लिए केवल जुमले और नारे हैं। मोदी और उनकी सरकार ने खुद ही अच्छे दिनों की बात करना बंद कर दिया है। इस बार विरोधी की प्रकृति अलग है। हम नकारात्मकता का प्रभावी जवाब सकारात्मकता और वैकल्पिक एजेंडे से देंगे। कांग्रेस सत्ता में वापसी के लिए आश्वस्त है।



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पी चिदंबरम।

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