सांप्रदायिकता को नया चेहरा और नई भाषा गढ़नी होगी, उसका मुलम्मा छूटता जा रहा है
नई दिल्ली. दिल्ली ने भारतीय राजनीति में ऐसा दलदल बना दिया है कि जिसमें अब किसी भी राजनीतिक दल और राजनेता के पांव धंस सकते हैं। यह दलदल भारतीय राजनीति के लिए वरदान हो सकता है, क्योंकि यह चुनाव परिणाम कोई संदेश देता हो या न देता हो, कुछ निश्चित संकेत जरूर दे रहा है।
इस चुनाव में कौन जीता और कौन हारा, अगर बात यही कहने की है तो किसी लेख की जरूरत ही क्या है। मेरे लिखने और आपके पढ़ने से पहले सारी दुनिया यह जान चुकी है। इसलिए मैं किसी की हार या जीत की भाषा में इस परिणाम को न समझ रहा हूं और न समझाना चाहता हूं। मैं मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की तरह यह भी नहीं कह सकता कि दिल्ली पर यह हनुमानजी की कृपा की बारिश हुई है। भाजपा के लोगों के उस मेंढकी-बोल में अपनी बात भी नहीं मिला सकता, जो लगातार यही कहने में लगे हैं कि चुनाव में हार-जीत तो होती ही है। यह सब अर्थहीन सियासत की वह भाषा है, जो लोक को भीड़ में बदल कर संतोष पाती है और जो बीते सालों में खूब भुनाई गई।
हनुमानजी को अपनी कृपा बरसाने के लिए किसी चुनाव की जरूरत क्या है? हनुमानजी क्या, दूसरे भी कई भगवानजी हैं, जिनका राजनीतिक दलों ने बखूबी इस्तेमाल किया तो फिर चुनावों में भक्त क्यों, भगवान ही क्यों न खड़े किए जाएं। अगर चुनाव में जीत या हार वैसी ही है, और होनी चाहिए कि जैसे खेल में होती है तब भाजपा क्या अमित शाह के उस जहरीले बयान का औचित्य बताएगी कि बटन यहां दबे ऐसे कि वहां शाहीन बाग में करंट लगे।
अगर करंट लगाने की ही हसरत थी तो शाह कह सकते थे कि यहां ऐसा बटन दबाएं कि वहां जनपथ में करंट लगे। वे ऐसा कहते तब बात राजनीतिक होती, लेकिन बात जहर से भी ज्यादा जहरीली हो गई जब उन्होंने करंट शाहीन बाग पहुंचाने की बात कही। तब बयान राजनीतिक न रहकर भारतीय समाज के टुकड़े करने वाला बन गया। उस बयान से दिल्ली के सामान्य मतदाता ने ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ को ठीक से पहचान लिया (कपड़ों से नहीं, चेहरे से)। दिल्ली के चुनाव परिणाम की यह सबसे बड़ी घोषणा है।
मैं यह नहीं कह रहा हूं कि भारतीय राजनीति में अब हिंदुत्ववादी ताकतें बेअसर हो गई हैं। कहना चाहता हूं तो बस इतना ही कि दिल्ली चुनाव के बाद सांप्रदायिकता को अपना नया चेहरा और नई भाषा गढ़नी होगी। उसका मुलम्मा छूटता जा रहा है। इस चुनाव नतीजे ने इससे कहीं ज्यादा और कहीं दूर तक की बातें भी कही हैं।
पहली यह कि भाजपा ने अपनी वह अतिरिक्त चमक खोनी शुरू कर दी है, जो 2014 से नरेंद्र मोदी के नाम से दमकती थी। यह दमक क्या थी? दरअसल वह चमक अतिशय लापरवाह, बेपरवाह और भ्रष्ट कांग्रेस की मनमोहन सिंह की सरकार से हताश और निराश देश की घुटन और किंकर्तव्यविमूढ़ता का परिणाम थी। किसी तारणहार के भरोसे रहने-जीने की सामंती मानसिकता के अवशेष हमारे मन में गहरे बैठे हैं। उसे भुनाने के लिए नरेंद्र मोदी की अवतारी छवि गढ़ी गई।
जो गढ़ा जाता है, वह बिखर भी जाता है। यह तो सच है, लेकिन इतनी जल्दी बिखराव? ऐसा अनुमान तो किसी को भी नहीं था। उन्हें भी नहीं, जिन्होंने मोदी की ऐसी छवि गढ़ने में बहुत कुछ निवेश किया था। मोदी की छवि का यह बिखराव इस बात का संकेत है कि भारतीय मतदाता प्रौढ़ हो रहा है। उसे विमूढ़ बनाए रखने में जिनका निहित स्वार्थ है, वे तरह-तरह के जाल बुनते हैं, बुनते रहेंगे, लेकिन समय के साथ-साथ प्रौढ़ होता हमारा मतदाता हर जाल काटना सीख रहा है। दिल्ली का चुनाव नतीजा यही दिखाता है।
कभी विनोबा भावे ने भारतीय चुनाव का चारित्रिक विश्लेषण करते हुए कहा था कि यह आत्म-प्रशंसा, परनिंदा और मिथ्या-भाषण का विराट आयोजन होता है। ऐसा कहते हुए भी क्या उन्हें इसका अंदाजा था कि सत्ता फिसलने का अंदेशा हमारे शासकों को कितना क्रूर और शातिर बन देता है? अगर आज वे होते तो संभवत: अवाक रह जाते। दिल्ली के चुनाव प्रचार के दौरान हमने प्रतिदिन इसका नया ही चारित्रिक पतन देखा। भाजपा को जब ऐसा लगने लगा कि हिंदुत्व की सामान्य अपील, सांप्रदायिकता, मंदिर और पाकिस्तान का खतरा जैसे पत्ते काम नहीं कर रहे तो उसके शीर्ष नेतृत्व ने नफरत फैलाने के हरसंभव बाण चलाए। चुनाव जीतने के लिए कभी, किसी दल ने सार्वजनिक जीवन में कभी इतना जहर नहीं घोला होगा, जितना इस बार घोला गया। गंदी भाषा, गंदे इरादे और गंदे संकेत सब इस्तेमाल किए गए। हमने शर्म और क्षोभ से देखा कि यह सब ऊपर से परोसा जा रहा था, नीचे से तो बस उसकी भद्दी नकल की जा रही थी।
पार्टी, चुनाव प्रक्रिया, चुनाव आयोग का इतना पतन कराने बाद भी भाजपा के हाथ क्या लगा? पिछली बार से इस बार दोगुनी से ज्यादा सीटें मिलीं। पहले 3 थीं, अब 8 हुई हैं। 62 के सामने 3 और 8 समान रूप से निरर्थक हैं। मतलब, विपक्ष अब तक जैसी भूमिका अदा करता आया है, वैसे ही करता रहेगा तो वह तेजी से संदर्भहीन होता जाएगा। भाजपा आज वैसे ही किसी मुकाम पर खड़ी है। भाजपा का मुकाबला करने के लिए आम आदमी पार्टी ने राजनीतिक चतुराई और तुलनात्मक रूप से ज्यादा संयम दिखलाया।
और जब मैं यह लिख रहा हूं, तब मुझे यह भी लिखना चाहिए कि कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने भी चाहे-अनचाहे इसमें आम आदमी पार्टी की मदद की। यह अच्छा होता और यह हो सकता था कि आप और कांग्रेस किसी गठबंधन का स्वरूप तैयार करते और एक-दूसरे को मजबूत करते हुए चुनाव में उतरते। अगर ऐसा होता तो भाजपा की राह और भी कठिन हो जाती। राजनीतिक दूरदर्शिता और नए प्रयोग करने का खतरा उठाने की हिचकिचाहट के कारण ऐसा नहीं हो सका और कांग्रेस ने अपना बहुत सारा धन और जन बर्बाद किया। लेकिन उसने यह सावधानी भी रखी कि जो लड़ाई उससे सध नहीं पा रही थी, उसे ज्यादा सुनियोजित ढंग से लड़ने में आप की मदद हो जाए। पिछली बार भी कांग्रेस अपना खाता नहीं खोल पाई थी, इस बार भी नहीं खोल पाई। लेकिन इस बार की ऐसा ही हुआ। लोकतंत्र के लिए यह जरूरी समझदारी है कि आप दोस्त और दुश्मन, दो ही चश्मे से संसार को न देखें।
आप को भी इसका अहसास हुआ होगा कि आज की जीत कल की पराजय में न बदल जाए, इसके लिए गाल बजाने से कहीं ज्यादा जरूरी है काम, क्योंकि यह दिखता भी है और बोलता भी है। जरूरतमंद तबके में आप अपना काम लेकर पहुंची और केंद्र की तमाम अड़चनों को पार करते हुए काम करती रही, इसी बात ने उनके पक्ष में वातावरण बनाया। यह उन सभी पार्टियों के लिए दिल्ली का संकेत है- काम करो, वह बोलेगा!… वह बोला भी।
(लेखक गांधी पीस फाउंडेशन के अध्यक्ष हैं)
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