9 साल की बच्ची ने कहा 41 साल बाद आऊंगी सबरीमाला
केरल का सबरीमाला मंदिर चर्चा का विषय बना हुआ है। पुरानी रीतियों और परंपराओं के अनुसार देशभर में ऐसे कुछ चुनिंदा मंदिर स्थापित हैं जहां पर महिलाओं का प्रवेश वर्जित माना गया है और सबरीमाला मंदिर भी उन्हीं में से एक है। सबरीमाला मंदिर के ईष्ट देव भगवान अयप्पा के बारे में कहा जाता है कि वो ब्रह्मचारी हैं और इस वजह से उनके मंदिर में 9 साल से अधिक और 50 साल से कम आयु की महिलाओं को प्रवेश नहीं दिया जाता है क्योंकि ये मासिक धर्म की उम्र होती है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस तथ्य को निराधार बताते हुए महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दे दी थी लेकिन इससे जनता और पुरुषों और धर्म का नाम लेकर दंगा करने वाले लोगों में आक्रोश था। जिस दिन महिलाएं पहली बार मंदिर में प्रवेश करती उसकी सुबह से ही मंदिर के बाहर दंगा और विरोध प्रदर्शन शुरु हो गया।
सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश को लेकर कई तरह की बात कहीं जा रही हैं लेकिन इसके लिए प्रदर्शन कर रही एक छोटी सी बच्ची ने सभी को हैरान कर दिया है। दरअसल, इस बच्ची ने मंदिर में एक उम्र की महिलाओं का प्रवेश ना देने के फैसले को सही बताया है। रविवार को सोशल मीडिया पर एक तस्वीर खूब वायरल हुई जिसमें एक 9 साल की बच्ची ने हाथ में बोर्ड ले रखा था जिस पर लिखा कि वो 41 साल बाद 50 की उम्र पार कर सबरीमाला में भगवान अयप्पा के दर्शन करने आएगी।
रविवार को सबरीमाला मंदिर में 9 साल की पद्मापूर्णी हाथ में पोस्टर लेकर पहुंची थी। इस पोस्टर पर लिखा था कि ' मैं 9 साल की हूं और अब मैं तीसरी बार मंदिर में दर्शन करने आई हूं लेकिन अब दोबारा मैं 41 साल बाद 50 की होने के बाद ही साल 2058 में दर्शन करने आऊंगी।
पद्मापूर्णी का कहना है कि वो लोगों के बीच मंदिर की प्राचीन पंरपरा को जीवित रखने का संदेश देना चाहती है और इसलिए उसके परिवार ने उसे ये पोस्टर बनाकर दिया है। उसने ये भी कहा कि उसे इस बात का बिलकुल भी दुख नहीं है कि उसे अब मंदिर में दर्शन करने के लिए 41 साल तक इंतजार करना होगा। अयप्पा उसके दिल में बसते हैं और हमेशा उसके साथ हैं।
आपको बता दें कि सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर बात बहुत ज्यादा खराब हो गई थी और पूरे केरल में हिंसा का माहौल हो गया था।
वैसे ये प्राचीन परंपराएं और नीतियां भी अजीब हैं जो पूजा में भी लिंग के भेदभाव को बीच में ले आती हैं। महिलाओं ने खुद तो अपने लिए मासिक धर्म को नहीं चुना, ये सब तो उन्हें खुद ईश्वर से मिला है तो फिर उन्हें इस वजह से उसी ईश्वर की पूजा करने से कैसे रोका जा सकता है।
जब इससे ईश्वर को कोई आपत्ति नहीं है तो धर्म के ठेकेदार क्यों स्वामी बने फिरते हैं, क्या भगवान अयप्पा ने उनसे ऐसा नियम बनाने को कहा था ?
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