मी टू कैंपेन से जुड़ने से पहले दें इन 4 सवालों के जवाब
इन दिनों सोशल मीडिया पर मी टू कैंपेन खूब सुर्खियां बटोर रहा है। इस कैंपने की शुरुआत हॉलीवुड प्रोड्यूसर हार्वी वाइंस्टाइन पर लगे आरोपों से शुरु हुई थी और इसे भारत पहुंचने में भी बिलकुल देर नहीं लगी। मी टू कैंपेन में अब बॉलीवुड की अभिनेत्रियों ने भी खुललर हिस्सा लेना शुरु कर दिया है। किसी ने सोचा भी नहीं था कि भारत में ये कैंपने इतना बड़ा रूप ले लेगा।
रोज़ इस कैंपन को लेकर 2-3 नए लोगों का नाम सामने आता रहता है जिन्होंने अभिनेत्रियों का गलत फायदा उठाने की कोशिश की। इस कैंपेन के समर्थन और विरोध में खड़े होने वाले लोगों की कोई कमी नहीं है। अगर आप भी इस कैंपेन के समर्थन और विरोध को लेकर असमंजस में हैं और तय नहीं कर पा रहे हैं कि आपको किसका साथ देना है तो ज़रा इन 4 सवालों के जवाब देकर आप अपनी मुश्किल को हल कर सकते हैं।
क्या महिलाएं उत्पीड़न की झूठी शिकायत नहीं कर सकती हैं
इस कैंपेन में आरोप लगाने वाली महिलाओं की कोई गारंटी नहीं है कि वो जो भी कह रही हैं वो सच है। वहीं पहली नज़र में महिलाओं के आरोप को गलत ठहराना और उन्हें उल्टा सीधा कहना भी सही नहीं है। जांच के बाद ही सच सामने आता है। एक्ट्रेसेस ने जिन लोगों का पर आरोप लगाएं हैं वो भी सोशल मीडिया पर अपनी सफाई दे सकते हैं या वो अपनी कमेटी में शिकायत कर सकते हैं या कोई लीगल एक्शन भी ले सकते हैं। जो महिलाएं पूरी दुनिया के आगे किसी मर्द पर उंगली उठा रही हैं उनकी बात में थोड़ी सच्चाई तो होगी ही।
महिलाओं ही क्यों होती हैं उत्पीड़न का शिकार
महिला और पुरुषों के स्वभाव में ज्यादा अंतर नहीं होता, अंतर होता है तो इनको मिली पॉवर में। समाज में पुरुषों को ज्यादा ताकत दी गई है और इसलिए शोषण का शिकार ज्यादातर महिलाएं ही होती हैं।
गांव की महिलाओं को इस कैंपेन से मदद मिलेगी?
इस कैंपेन में ज्यादातर हाई प्रोफाइल और शहरी महिलाएं हिस्सा ले रही हैं और अपने साथ हुए उत्पीड़न और यौन हिंसा के किस्से साझा कर रही हैं। इस कैंपेन में वर्किंग क्लास, दलित, मिडल क्लास सभी वर्ग की महिलाएं शामिल हैं। अगर सभी महिलाएं और देश के ताकतवर लोग इस कैंपेन को सहारा और मजबूती दें तो इससे ग्रामीण महिलाओं को भी फायदा होगा।
किसी को लुभाने और उत्पीड़न में क्या अंतर है
इस कैंपेन में उन महिलाओं ने हिस्सा लिया जिनके साथ कभी ना कभी पुरुषों ने गलत व्यवहार किया। उस वक्त तो वो किसी दबाव, डर या मजबूरी की वजह से बोल नहीं पाईं और सालों तक उस बोझ को अपने दिल पर लेकर जीती रहीं। इस कैंपेन की शुरुआत बस अपने विचारों को रखने के लिए की गई थी और इसमें लीगल एक्शन की कोई बात नहीं थी लेकिन अब महिलाएं इस बारे में भी सोच रही हैं।
अगर आप भी चाहते हैं कि महिलाएं अपने साथ हुए गलत व्यवहार के खिलाफ आवाज़ उठाएं तो इस कैंपने को सपोर्ट करें।
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