1999 में चुनाव आयोग ने रोकी थी करगिल से जुड़ी टीवी सीरीज, अब एयर स्ट्राइक का राजनीतिकरण रोकने की मांग

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बालाकोट में भारत की एयर स्ट्राइक चुनावी मुद्दे में तब्दील होती नज़र आ रही है। दरअसल प्रधानमंत्री मोदी अपनी सभाओं में इसका जिक्र कर रहे हैं। कांग्रेस व अन्य विपक्षी दलों के नेताओं की सोच है कि यह राजनीतिकरण मोदी को लोकसभा चुनाव में फायदा पहुंचा सकता है। इसलिए कुछ विपक्षी नेता स्ट्राइक के सबूतों के बहाने उन्हें घेरने में जुटे हैं। जानिए इस स्ट्राइक के राजनीतिकरण और सबूतों की मांग से जुड़ा वो सबकुछ जो आप जानना चाहते हैं...

यह है विवाद :पुलवामा के आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान में एयरस्ट्राइक तो की, लेकिन इसके बाद से ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा विपक्षियों के निशाने पर है। इसका कारण सेना के पराक्रम को भुनाने के आरोप हैं। मोदी व भाजपा द्वारा रैलियों में इसके जिक्र के साथ भारत सरकार ने एक विज्ञापन में भी सर्जिकल व एयरस्ट्राइक का जिक्र किया है। यही वजह है कि कांग्रेस व विपक्षी नेता मोदी और भाजपा को झूठा साबित करने में जुटे हैं। वैसे अब नज़र चुनाव आयोग पर भी है कि वो इस मामले में क्या करता है।


इसकी दो वजह है...


1. पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल एल रामदास ने चुनाव आयोग को एक चिट्ठी लिखकर मांग कर दी है कि राजनीतिक फायदे के लिए सशस्त्र बलों की कार्रवाई का इस्तेमाल बंद किया जाए। उन्होंने लिखा है कि पुलवामा हमला, बालाकोट की हवाई कार्रवाई और विंग कमांडर अभिनंदन की पाकिस्तान से वापसी के मुद्दे को मतदाताओं को लुभाने के लिए इस्तेमाल करने से रोकने के लिए चुनाव आयोग को तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए।


2. 1999 के चुनाव में ऐसी ही परिस्थिति में चुनाव आयोग हस्तक्षेप कर चुका है। तब करगिल युद्ध खत्म हुआ ही था। देशभक्ति का माहौल था। मगर कोई पार्टी इसका फायदा न उठा ले, इस उद्देश्य से चुनाव आयोग को विशेष प्रेस रिलीज जारी करनी पड़ी। इसमें आयोग ने सरकार को दूरदर्शन पर करगिल से जुड़ी डॉक्यूमेंट्री का प्रदर्शन चुनाव तक रोकने की हिदायत दी। उस समय दूरदर्शन पर करगिल युद्ध से जुड़ी एक सीरीज दिखाई जा रही थी।

वॉशिंगटन पोस्ट भी राजनीतिकरण की बात कह चुका है :चीन के अखबार ग्लोबल टाइम्स तथा पीपुल्स डेली भारत-पाकिस्तान के मुद्दे पर चुप रहे। इससे उलट वॉशिंगटन पोस्ट ने शुरुआत में भारत का पक्ष लिया, लेकिन बाद में एक आर्टिकल में कहा कि यह मुद्दा इतना बड़ा नहीं है। मगर इसका राजनीतिकरण हो रहा है, क्योंकि भारत में चुनाव है।

अमेरिका, रूस सहित कई देश करते रहे हैं एेसा :विदेशी मामलों के जानकार रहीस सिंह कहते हैं कि किसी भी लोकतांत्रिक देश में सरकारें विदेशी धरती पर किए गए सैन्य अभियान को भुनाने का प्रयास करती हैं। 2003 में अमेरिका द्वारा इराक में चलाए गए सैन्य अभियान को जॉर्ज बुश ने भुनाया और 2004 के चुनावों में फिर जीते। क्रीमिया को यूक्रेन से अलग करने के लिए रूस ने सेना का इस्तेमाल किया। पुतिन ने इसे भुनाया और चौथी बार राष्ट्रपति बने। तुर्की की सरकार भी कुर्दों पर हमले कर राजनीतिक फायदा उठाती रही है।

वहीं सीरिया में अभियान को रूस और अमेरिकी सरकारों ने अपने-अपने पक्ष में ले जाने की कोशिश की। रूस की तरह ईरान भी सीरिया में अमेरिका समर्थित विद्रोहियों के खिलाफ राष्ट्रपति बशर अल-असद के साथ बना रहा। उन्हें सैन्य संसाधन मुहैया कर शिया मुस्लिमों के समर्थन के बहाने अपने देश की शिया आबादी को खुश करने में जुटा रहा है। ये सभी देश इस बात के सबूत हैं कि लोकतंत्र में सरकारें सैन्य अभियानों के बाद मतदाताओं के बीच इसका प्रचार करती हैं। हालांकि भारत में फिलहाल इस तरह का प्रचार ज्यादा है।

3 युद्धों में भारत जीतापर सत्ता पक्ष को चुनाव में नुकसान

  • 1965 के युद्ध के बाद : तब लाल बहादुर शास्त्री प्रधानमंत्री थे। युद्ध के दो साल बाद 1967 में आम चुनाव हुए। कांग्रेस चुनाव जीत तो गई, लेकिन उसे 78 सीटों का नुकसान हुआ। कांग्रेस को 283 सीटें मिली थीं।
  • 1971 के युद्ध के बाद: मार्च 1971 में भारत की मदद से बांग्लादेश अलग देश बना। युद्ध के बाद चुनाव 1977 में हुए। कांग्रेस 352 सीटों से 154 सीट पर जा सिमटी। चुनावों पर इमरजेंसी का बड़ा असर दिखा।
  • 1999 में करगिल युद्ध के बाद : महज एक साल पहले बनी वाजपेयी सरकार गिर गई। फिर से चुनाव हुए, लेकिन पाकिस्तानी घुसपैठियों को खदेड़ने के प्रचार के बावजूद भाजपा को दो सीटों का नुकसान हुआ।

विवाद की यह है वजह :स्ट्राइक के दिन मोदी ने रैली में किया इशारा, शाह ने दिया 250 की मौत का आंकड़ा

सबूतों पर क्यों हो रहा है इतना विवाद?

क्योंकि पाक ने सच छिपा लिया :26 फरवरी की सुबह पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल आसिफ गफूर ने कुछ तस्वीरें जारी की और बताया कि भारतीय एयर स्ट्राइक में सिर्फ कुछ पेड़ गिरे हैं। हालांकि न पाकिस्तान की सेना ने, सरकार ने, न ही वहां के मीडिया ने अब तक बालाकोट की उस इमारत का हाल पेश किया, जहां भारत की ओर से हमले का दावा है। उस दिन भी पाक विदेश मंत्री ने यही कहा कि विदेशी मीडिया को हमले वाली जगह ले जाएंगे, लेकिन अभी मौसम साफ नहीं है।

हमारी सरकार ने भी उलझाया :हमले के दिन विदेश सचिव विजय गोखले ने कहा एयरस्ट्राइक में बड़ी संख्या में आतंकी, प्रशिक्षक, सीनियर कमांडर और जिहादी मारे गए हैं। दो दिन बाद एयर वाइस मार्शल रवि कपूर ने कहा कि हम जिस ठिकाने को तबाह करना चाहते थे, कर दिया। मगर इसके उलट 1 मार्च को केंद्रीय राज्य मंत्री एसएस अहलूवालिया ने कह दिया कि यह हमला चेतावनी देने के लिए था, मारने के लिए नहीं। सेना और सरकार के इन अलग-अलग बयानों से उलझन बढ़ी।

ये सबूत तो आए, लेकिन आंकड़े स्पष्ट नहीं

2 सबूत जो विदेशी मीडिया की ओर से आए

  • पाकिस्तान में आतंकवाद पर नजर रखने वाली इटली की पत्रकार फ्रांसेस्का मारिनो ने एक रिपोर्ट में बालाकोट में हुए नुकसान का ब्योरा दिया है। उन्होंने आसपास के लोगों और प्रत्यक्षदर्शियों से जुटाई जानकारी के आधार पर लिखा है कि पाकिस्तानी सैनिकों ने उस क्षेत्र से 35 शव बाहर निकाले हैं। सेना द्वारा उस क्षेत्र को घेरे में ले लिया गया। राहत के लिए पहुंची एंबुलेंस और चिकित्साकर्मियों के मोबाइल फोन तक कब्जे में ले लिए थे।
  • आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर के छोटे भाई अम्मार ने भी एयर स्ट्राइक की पुष्टि की है। उसका एक ऑडियो सामने आया है, जिसमें वह जैश के ठिकानों की तबाही की बात कह रहा है। यह ऑडियो 28 फरवरी का है। पाकिस्तान से निष्कासित वरिष्ठ पत्रकार ताहा सिद्दीकी ने यह ऑडियो ट्विटर पर पोस्ट किया है। इस ऑडियो को हुसैन हक्कानी ने री-ट्वीट किया है। वे 2008 से 2011 के बीच अमेरिका में पाकिस्तान के एम्बेसडर रहे हैं।

1 बड़ा सबूत तो हमारे एक्सपर्ट ही दे रहे हैं :सैटेलाइट तस्वीरों का अध्ययन करने वाले कर्नल विनायक भट (रिटायर्ड) के अनुसार जिन इमारतों पर स्ट्राइक की गई, वहां चढ़ी लोहे की चादरों पर निशान दिख रहे हैं। एस-2000 बम इन चादरों को भेदकर अंदर गए होंगे। फिर विस्फोट किया होगा। माना जा रहा है कि इन छतों को रिपेयर कर पेंट किया गया है। हालांकि अंतरराष्ट्रीय न्यूज एजेंसी रॉयटर्स ने ये ही तस्वीरें दिखाकर एयरस्ट्राइक पर संदेह व्यक्त किया था।

क्या सरकार को सार्वजनिक करने चाहिए सबूत? :न्यूज एजेंसी पीटीआई के अनुसार 6 मार्च को भारतीय वायु सेना ने राडार और उपग्रह से ली गई हाई रिजॉल्यूशन तस्वीरों की 12 पन्नों की रिपोर्ट सरकार को सौंपी है। सेना कह रही है कि उसके तकरीबन 80 फीसदी निशाने लक्ष्य पर लगे हैं। वैसे विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को ये सबूत सार्वजनिक नहीं करना चाहिए। इससे पाक या अन्य देश भारतीय खुफिया एजेंसियों के सूचनाएं जुटाने के तरीकों को समझ जाएंगे। अमेरिका ने भी 9/11 हमले के साजिशकर्ता लादेन को मारने के सबूत सार्वजनिक नहीं किए। कुछ संगठनों ने मृत ओसामा की तस्वीरें सार्वजनिक करने के लिए कोर्ट की शरण ली, कोर्ट ने टॉप सीक्रेट कहते हुए इससे इनकार कर दिया।

आगे यह होगा :पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एमएस गिल कहते हैं कि राजनेताओं की बयानबाजी पर तो रोक लगाने का कोई तरीका नहीं है। वे दावे कर सकते हैं। यह कई माह चलता रहेगा। आचार संहिता लगने के बाद भी सिर्फ सरकार की ओर से किए जा रहे प्रोपेगेंडा पर कुछ रोक लगेगी। वे इश्तिहार में सेना के पराक्रम का जिक्र नहीं कर सकते, जैसा अभी कर रहे हैं। गिल खुद भी चुनाव आयोग से इस पर रोक लगाने की मांग करने जा रहे हैं। वहीं चुनाव आयोग पूर्व नौसेना प्रमुख एडमिरल एल रामदास की उस चिट्ठी पर भी विचार करेगा, जिसमें सेना के पराक्रम के राजनीतिकरण को रोकने की बात है।



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EC had stopped the TV series related to Kargil in 1999.

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