टीआरएस का वोट खैरात की लहर पर सवार, विपक्ष हताश
आदित्या लोक, स्पेशल करोस्पोंडेंट:
हैदराबाद. तेलंगाना राष्ट्र समिति सरकार की पिछले पांच सालों में दोनों हाथों से बांटी गई खैरात के सैलाब में विपक्षी पार्टियां इस तरह बह गई हैं कि इस चुनाव में उन्हें किनारा नजर नहीं आ रहा। देश के सबसे नए राज्य में एक नया राजनीतिक फार्मूला उभरा है। विकास + खैरात+ नेताओं की खरीद-फरोख्त = विपक्ष का सफाया। टीआरएस पोलित ब्यूरो के सदस्य केशव राव यह कहते हैं- हम वेलफेयर स्टेट को एक नई ऊंचाई पर ले गए हैं और मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव की लोकप्रियता के सामने टिकने वाला कोई दूसरा नेता राज्य में दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता। विपक्षी पार्टियों के नेता भी दबी जुबान से इससे सहमत नजर आते हैं।
महज तीन महीने पहले हुए विधान सभा चुनाव में राजनीति के चतुर खिलाड़ी राव (जिन्हें यहां सब प्यार से केसीआर कहते हैं) ने 119 में से 88 सीटें हासिल की थी। अगर लोकसभा सीटों के संदर्भ में उन नतीजों को देखें तो राज्य की 17 में से 15 सीटों पर टीआरएस और उसके सहयोगी दल मजलिस-ए-इत्तेहादुल-मुसलमीन की बढ़त थी। चालीस सदस्यीय विधान परिषद में इस सप्ताह तक विपक्ष का एक ही मेंबर था क्योंकि विपक्षी दलों से जीते विधायक टीआरएस में आ रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषक अरविंद यादव कहते हैं- केसीआर एकछत्र राज्य चाहते हैं। वे विपक्ष को नेस्तनाबूद करने में यकीन रखते हैं। 2014 के विधानसभा चुनाव में टीआरएस ने 119 में से 63 सीटें जीती थीं। पर सदन का कार्यकाल पूरा होने तक उसने दूसरी पार्टियों से बटोर कर 88 एमएलए जुटा लिए थे। टीआरएस की कट्टर राजनीतिक दुश्मन टीडीपी का एकमात्र सांसद अब केसीआर सरकार में मंत्री है। केसीआर की गलाकाट पॉलिटिक्स ने विपक्ष में हताशा पैदा कर दी है।
कांग्रेस ऑफिस में शाम ढलते ही ताला लग जाता है। दिन में इक्का-दुक्का लोग ही नजर आते हैं। पार्टी नेता, खासकर विधायक, टीआरएस की ओर भाग रहे हैं। दिसंबर में कांग्रेस के पास 19 विधायक थे। तीन महीने बाद नौ बचे हैं। पलायन से परेशान कांग्रेस ने राज्य में राष्ट्रपति शासन की मांग की है। खम्मम से कांग्रेस की लोकसभा उम्मीदवार रेणुका चौधरी कहती हैं- विधायकों को ढोरों जैसे खरीदा जा रहा है। उधर पांच विधायकों से एक पर सिमट गए भाजपा का दफ्तर भी दिन भर ऊंघता रहता है। न नेता नजर आते हैं, न कार्यकर्ता।
महज पांच साल पहले तक यहां राज करने वाली चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम ने टीआरएस को वॉकओवर दे दिया है। 1983 में अपनी स्थापना के समय के बाद पहली बार टीडीपी तेलंगाना में चुनाव नहीं लड़ेगी। वैसे भी यहां उसकी हालत खस्ता है। पिछले विधान सभा चुनाव में उसने 118 उम्मीदवार खड़े किए थे और उनमें से केवल दो जीते थे। सारे सर्वे और ओपिनियन पोल तेलंगाना में टीआरएस के तूफान की चेतावनी दे रहे हैं।
पर ऐसा भी नहीं है कि विपक्ष का जनाधार पूरी तरह खत्म हो गया है। पिछले महीने हुए पंचायत चुनाव में कांग्रेस समर्थित उम्मीदवारों ने लगभग 30 प्रतिशत सीटें हासिल की थी। उन्होंने कई जगह टीआरएस उम्मीदवारों को कड़ी टक्कर दी थी। टीआरएस में आने से पहले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे केशव राव कहते हैं- कांग्रेस में यहां अभी भी दम है, विधान परिषद के लिए इस हफ्ते हुए चुनाव में टीआरएस समर्थित उम्मीदवार तीनों सीट बुरी तरह हारे।
भाजपा कमजोर जरूर रही है, पर नमो के अपने फैन हैं।खासकर हैदराबाद के इलाके में। यहां के राजू कहते हैं, 'दो ही शेर होता, इधर केसीआर, दिल्ली में मोदी।' पर क्योंकि उनके सामने दो में से एक ही शेर चुनने की मजबूरी है, तो उनकी पसंद साफ है। तेलंगाना के नतीजे भी शीशे की तरह साफ हैं।
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