असम: 3 सीटें ‘रुहानी ताकतों’ वाले मौलाना के पास, विकास के मुद्दे पर उनसे नाराजगी है
आदित्या लोक, स्पेशल करोस्पोंडेंट:
राजेश माली, धुबरी (असम). 14 साल की हलिमा बेगम अम्मी आलिया के साथ आई है। हाथ में शहद की शीशी है। अम्मी को भरोसा है कि सांसद मौलाना बदरुद्दीन अजमल शहद में फूंक मारकर दुआ देंगे तो हलिमा बोलने लगेगी। अजमल ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) के प्रमुख हैं। लोग मानते हैं-उन्हें रूहानी ताकतें भी हासिल हैं। दुआ देकर किसी का भी दुख-दर्द दूर कर सकते हैं। यही वजह है कि वे दो बार मुस्लिम बहुल सीट धुबरी से जीत चुके हैं। पिछले चुनाव में उनकी पार्टी बरपेटा और करीमगंज से भी जीती थी। धुबरी में कांग्रेस व असम गण परिषद (अगप) विकास को मुद्दा बना रही है। धुबरी के युवा देबज्योति दत्ता रोचक टिप्पणी करते हैं - 'इस बार एआईयूडीएफ को जनता कहेगी दुआओं में याद रखना...।'
धुबरी में 80% आबादी मुस्लिम है। कारोबारी बदरुद्दीन अजमल ने इस गणित को समझा और खुद की पार्टी बना ली। 2009 में पहली बार सांसद चुने गए। इत्र और रियल एस्टेट कारोबारी बदरुद्दीन टीम के साथ धुबरी पहुंच चुके हैं। उनके आसपास लोग इस उम्मीद से आए हैं कि मौलाना के 'हाथ' उनकी 'तकलीफ' दूर देंगे। कांग्रेस ने पूर्व विधायक अबू ताहेर बेपार को उतारा है।
कांग्रेस के जिला सचिव यूसुफ अली शेख कहते हैं- विकास ही सबसे बड़ा मुद्दा है। अगप ने पूर्व विधायक जावेद इस्लाम पर दांव खेला है। जावेद मूलत: कांग्रेसी हैं। पिता कांग्रेस सरकार में मंत्री रह चुके हैं। जावेद को संगठन की टूट से जूझना है। भाजपा से गठबंधन के विरोध में अगप जिलाध्यक्ष बिनायक चक्रवर्ती इस्तीफा दे चुके हैं। जिला सचिव दिलीप दत्ता कहते हैं -'इससे फर्क नहीं पड़ेगा। जावेद जमीनी नेता हैं।'
बरपेटा भी मुस्लिम बहुल सीट है। यहां भी एआईयूडीएफ को विकास के मुद्दे पर जूझना पड़ रहा है। बदरुद्दीन अजमल के भाई सिराजउद्दीन सांसद हैं। मेडिकल स्टोर संचालक अजीज उर रहमान की उनके बारे में राय है 'न वे यहां दिखते हैं, न कोई काम किया।' एआईयूडीएफ ने पूर्व विधायक रफीक उल इस्लाम को टिकट दिया। कांग्रेस से विधायक अब्दुल खलीक सामने हैं। अगप उम्मीदवार कुमार दीपक दास को त्रिकोणीय मुकाबले में मुस्लिम वोटों को बंटवारे में अपना फायदा नजर आ रहा है।
एससी रिजर्व सीट करीमगंज से एआईयूडीएफ ने सांसद राधेश्याम बिस्वास को फिर मौका दिया है लेकिन यहां भी विकास का मुद्दा भारी है। भाजपा ने विधानसभा उपाध्यक्ष कृपानाथ माल्ला को आगे किया है। सीट पर करीब 60% वोटर मुस्लिम हैं। त्रिकोणीय मुकाबले में मुस्लिम वोट बंटते हैं तो फायदा भाजपा को होगा।
सिलचर में बंगाली हिंदू बड़ा फैक्टर है। भाजपा ने डॉ राजदीप राय को उतारा है जो इसी बिरादरी से हैं। यहां नागरिकता संशोधन बिल (केब) के मुद्दे पर बंगाली हिंदू पक्ष में हैं। इससे भाजपा को फायदे की उम्मीद है। कांग्रेस उम्मीदवार व मौजूदा सांसद सुष्मिता देव ने केब का समर्थन किया है।
कोकराझार बोडो प्रभाव वाली है। उल्फा कमांडर रहे नब कुमार सरानिया पिछली बार निर्दलीय जीते और पहले गैर-बोडो सांसद बने। इसकी वजह गैर-बोडो मतदाताओं का एकजुट होना था। असमी और गैर-बोडो वोटरों की नाराजगी का फायदा नब कुमार को मिला था। वे फिर मैदान में है और उनका मुकाबला बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) व कांग्रेस से है।
मुद्दे : विकास सबसे बड़ा
- धुबरी, बरपेटा और करीमगंज में विकास का मुद्दा सबसे बड़ा है। सिलचर में केब के पक्ष में चर्चा है क्योंकि यहां बंगाली िहंदू ज्यादा है। इसका फायदा भाजपा को मिल सकता है।
- गठबंधन : असम में भाजपा-अगप और बीपीएफ एक साथ मैदान में हैं। इन पांच सीटों में से धुबरी पर अगप और कोकराझार पर बीपीएफ उम्मीदवार खड़े होंगे।
2014 की स्थिति
धुबरी, बरपेटा और करीमंगज एआईयूडीएफ के पास। सिलचर में कांग्रेस और कोकराझार में निर्दलीय।
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