देश में सट्टेबाजी अवैध, लेकिन 2500 करोड़ की फैंटेसी गेम इंडस्ट्री पर कोई रोक नहीं
आदित्या लोक, स्पेशल करोस्पोंडेंट:
नई दिल्ली. आईपीएल और क्रिकेट वर्ल्ड कप के दौरान एक विज्ञापन काफी चर्चित रहा। इसमें महेंद्र सिंह धोनी दर्शकों को अपनी टीम बनाने को कहते हैं। दरअसल, यह एक तरह का फैंटेसी यानी आभासी गेम है। इसमें आपको ऑनलाइन टीम बनानी होती है। आप फ्री एंट्री या पैसे वाले कॉन्टेस्ट में भाग ले सकते हैं। वैसे तो पैसे लगाकर दांव लगाना सट्टेबाजी माना जाता है, लेकिन इन पर यह कानून लागू नहीं होता।
इन कंपनियों का दावा है कि यह चांस की बात न होकर पूरी तरह स्किल बेस्ड गेम है, यानी इसमें आप कौशल के आधार पर खेलते हैं। यही बात इससे जुड़े केस की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने भी कही है। धोनी के अलावा सौरव गांगुली, युवराज सिंह, क्रिस गेल और हरमनप्रीत कौर जैसेखिलाड़ी भी इन कंपनियों से जुड़े हैं और इनका प्रमोशन कर रहे हैं। फैंटेसी स्पोर्ट्स की शुरुआत अमेरिका में 1952 में ही हो चुकी थी, लेकिन भारत में इसकी शुरुआत 2001 में ईएसपीएन-स्टार स्पोर्ट्स ने मिलकर की, 2003 में इसे बंद कर दिया गया।

देश में इस तरह की 70 से ज्यादा कंपनियां सक्रिय
फैंटेसी गेम्स की लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगा सकते हैं कि देश में ऐसी 70 से ज्यादा कंपनियां एक्टिव हैं। अकेले ड्रीम-11 में रोज 6 करोड़ से ज्यादा यूजर्स खेल रहे हैं। साल के अंत तक यह आंकड़ा 10 करोड़ के पार होने की उम्मीद है। ड्रीम-11 तो देश की पहली गेमिंग यूनिकॉर्न भी बन चुकी है। यूनिकॉर्न उन कंपनियों को कहा जाता है जिनकी वैल्यू कम से कम 100 करोड़ डॉलर (7,000 करोड़ रुपए) हो। हेज फंड स्टीडव्यू कैपिटल से दूसरे राउंड का निवेश मिलने के बाद ड्रीम-11 का वैल्यूएशन 100 करोड़ डॉलर से ज्यादा हो गया है। इसकी शुरुआत बेंटले यूनिवर्सिटी के एलुमनी भावित सेठ और पेंसिलवेनिया व कोलंबिया यूनिवर्सिटी के एलुमनी हर्ष जैन ने की थी।

देश में फिलहाल ऐसी 33 कंपनियां हैं जो पोकर, रमी, क्रिकेट, बास्केटबॉल, फुटबॉल से लेकर हॉकी और कबड्डी तक के ऑनलाइन गेम्स से जुड़ी हैं। आईएफएसजी ने इन्हें प्लेटिनम, गोल्ड, सिल्वर और ब्रॉन्ज़ कैटेगरी में बांटा हुआ है। इनमें ड्रीम11, बल्लेबाजी, माय11सर्कल, बादशाह गेमिंग, फैनफाइट, फैनकोड, रमी सर्कल, क्रिकप्ले प्रमुख हैं। ड्रीम इलेवन के यूजर्स 3 साल में 30 गुना बढ़कर 6 करोड़ पार कर चुके हैं।
ऑनलाइन गेमिंग में 20% यूजर्स फैंटेसी स्पोर्ट्स के, अगले साल 10 करोड़ पार होंगे
फैंटेसी गेमिंग कंपनियों के संगठन इंडियन फेडरेशन ऑफ स्पोर्ट्स गेमिंग (आईएफएसजी) की मार्च 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 25 करोड़ लोग ऑनलाइन गेम्स खेलते हैं। इनमें 7 करोड़ से ज्यादा यूजर्स फैंटेसी स्पोर्ट्स के हैं। जून 2016 से फरवरी 2019 के दौरान फैंटेसी स्पोर्ट्स खेलने वालों की संख्या 25 गुना बढ़ी है। साल के अंत तक इनकी संख्या 10 करोड़ के पार होने की संभावना है। वहीं ऑल इंडिया गेमिंग फेडरेशन (एआईजीएफ) के मुताबिक, भारत में 12 करोड़ गेमर हैं और तीन साल में इनकी संख्या में 30% से ज्यादा का इजाफा हुआ है।

5 राज्यों के निवासियों को खेलने की इजाजत नहीं
चौंकाने वाली बात यह है कि ड्रीम11 और माय सर्कल 11 जैसी कंपनियों ने अपनी वेबसाइट और एप पर शर्तों के तहत स्पष्ट रूप से लिखा है कि असम, ओडिशा, सिक्किम, नागालैंड और तेलंगाना के निवासी पैसा लगाकर जीतने वाली कॉन्टेस्ट में भाग नहीं ले सकते। इसके पीछे की वजह यह बताई गई है कि इन राज्यों में फैटेंसी गेम्स या इस तरह के गेम्स को लेकर कोई स्पष्ट कानून नहीं है। रमी सर्कल ने इन राज्यों के साथ केरल के निवासियों के भी खेलने पर रोक लगाई हुई है।
क्या यह ऑनलाइन सट्टेबाजी नहीं?
कुछ लोग इसे ऑनलाइन सट्टेबाजी या जुआ कह रहे हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। यह न तो सट्टेबाजी है और न अवैध ऑनलाइन जुआ। यह एक अलग तरह का ऑनलाइन फैंटेसी स्पोर्ट है। इसे काल्पनिक खेल कहते हैं जो पूरी तरह वैध है यानी कानूनी तौर पर सही है। लीगल एक्सपर्ट विराग गुप्ता बताते हैं कि फैंटेसी स्पोर्ट्स को लेकर देश में अभी कोई अलग से कानून नहीं है, लेकिन फैंटेसी स्पोर्ट्स ऑनलाइन खेला जाता है, इसलिए इसके खिलाफ आईटी एक्ट के तहत सिर्फ केंद्र सरकार ही कार्रवाई कर सकती है, राज्य सरकार नहीं। कानूनी शून्यता की यह स्थिति संघीय व्यवस्था में अच्छी नहीं मानी जा सकती।
संसद में भी फैंटेसी गेम्स की वैधता का मामला उठा था
फैंटेसी गेम्स की लगातार बढ़ती संख्या और यूज़र्स को देखते हुए इसकी वैधता को लेकर संसद में भी मामला उठ चुका है। मध्यप्रदेश के मंदसौर से भाजपा सांसद सुधीर गुप्ता ने भी ऑनलाइन बेटिंग वेबसाइट्स को लेकर सरकार से सवाल पूछे हैं। उन्होंने आईटी और कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद से पूछा है कि क्या सरकार का इस तरह की वेबसाइट्स पर रोक का कोई प्रस्ताव है।
सांसद ने सवाल पूछे थे
फरवरी 2019 में टीआरएस सांसद एपी जितेंदर रेड्डी ने फैंटेसी और ऑनलाइन गेमिंग की वैधता को लेकर कई सवाल पूछे थे। इसके जवाब में वित्त राज्य मंत्री पी राधाकृष्णन ने कहा था कि सट्टेबाजी और जुआ भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची की लिस्ट-2 में एंट्री 34 पर दर्ज है। उन्होंने यह भी कहा कि इस मामले पर कानून बनाने का अधिकार राज्य सरकारों को है। रेड्डी ने पूछा था- क्या केंद्र सरकार के पास फैंटेसी स्पोर्ट्स को रेगुलेट करने का कोई प्रस्ताव है? क्या केंद्र सरकार इस क्षेत्र में होने वाले वित्तीय लेनदेन की देखरेख के लिए कानून पारित करना चाहती है?
थरूर प्राइवेट मेंबर बिल पेश कर चुके हैं
कांग्रेस सांसद शशि थरूर भी स्पोर्ट्स (ऑनलाइन गेमिंग और धोखाधड़ी की रोकथाम) विधेयक, 2018 लोकसभा के शीत सत्र में बतौर प्राइवेट मेंबर बिल पेश कर चुके हैं। उनके मुताबिक सट्टेबाजी भले ही राज्य का विषय है, लेकिन ऑनलाइन गेमिंग संसद के अधिकार क्षेत्र में आती है। भारत में ऑनलाइन गेमिंग को रेग्युलेट करना महत्वपूर्ण है क्योंकि यह तेजी से बढ़ता क्षेत्र है। इससे राज्यों का राजस्व बढ़ाने और काले धन पर लगाम लगाने में मदद मिल सकती है। उन्होंने विधि आयोग की 276 वीं रिपोर्ट का हवाला दिया, जिसमें कहा गया है कि देश में ऑनलाइन गेमिंग का बाजार फिलहाल करीब 36 करोड़ डॉलर(करीब 2,520 करोड़ रुपए) का है। यह 2021 तक 100 करोड़ डॉलर (करीब 7,000 करोड़ रुपए) का होने की उम्मीद है।
भारत में क्या है सट्टेबाजी को लेकर कानून?
पब्लिक गैम्बलिंग एक्ट-1867 के मुताबिक, देश में सट्टेबाजी और जुए को अपराध माना गया है। कॉन्ट्रैक्ट एक्ट, मनी लॉन्ड्रिंग निरोधक कानून (पीएमएलए), फेमा, भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), आयकर और उपभोक्ता कानूनों के तहत सट्टेबाजी और जुआ गैर-कानूनी है। हालांकि, ये दोनों राज्य के विषय हैं। यानी राज्य चाहें तो इसके लिए अपने हिसाब से कानून बना सकते हैं। गोवा, दमन-दीव, तेलंगाना और सिक्किम में सट्टेबाज़ी और जुए से जुड़ी कई गतिविधियों को कानूनी मान्यता मिली हुई है। 1966 में सुप्रीम कोर्ट ने घुड़दौड़ और रमी में सट्टेबाजी को मान्यता देते हुए कहा था कि ये संयोग का खेल नहीं है, बल्कि इसमें चतुराई और कुशलता की जरूरत होती है।
सट्टेबाजी वैध हो जाए तो सरकार को सालाना 20 हजार करोड़ की कमाई होगी
रिसर्च फर्म स्टेटिस्टा के मुताबिक, 2012 में भारत में 88 अरब डॉलर (करीब 6.10 लाख करोड़ रुपए) का सट्टा लगा था। यह 2018 में बढ़कर 130 अरब डॉलर (करीब 9 लाख करोड़ रुपए) का हो गया। एक अनुमान के मुताबिक, भारत के हर क्रिकेट मैच में करीब 1,400 करोड़ रुपए का सट्टा लगता है। जुलाई 2018 में लॉ कमीशन ने और इससे पहले लोढ़ा समिति ने क्रिकेट में सट्टेबाज़ी को कानूनी मान्यता देने की सिफारिश की थी। लोढ़ा समिति की रिपोर्ट में उदाहरण दिया गया था कि इंग्लैंड, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और यूरोप के कुछ देशों में सट्टेबाजी वैध है, जिससे इन देशों को टैक्स वसूलने से काफी फायदा होता है। अगर भारत में भी सट्टेबाजीको वैध कर दिया जाता है तो सरकार को सालाना करीब 20 हजार करोड़ रुपए तक का रेवेन्यू मिल सकता है।
(स्रोतः ड्रीम11, आईएफएसजी, केपीएमजी, एआईजीएफ, लोकसभा, गेम्स वेबसाइट्स)
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