बत्रा टॉप से लौटकर भाई विशाल ने कहा- मैं विक्रम से मिलने गया था, उसे अपने भीतर भरकर लौटा हूं

आदित्या लोक, स्पेशल करोस्पोंडेंट:

नई दिल्ली.करगिल युद्ध को 20 साल हो गए। कैप्टन विक्रम बत्रा के जुड़वां भाई विशाल ने पिछले दिनों प्वाइंट 4897 चोटी की यात्रा की। इस चोटी को अब 'बत्रा टॉप 'कहते हैं, क्योंकि विक्रम बत्रा की टीम ने पाकिस्तानी दुश्मनों से इसे छुड़ाया था, लेकिन इस दौरान वे शहीद हो गए थे।विशाल ने 17 हजार फीट ऊंचे बत्रा टॉप से लौटकर सुनाए जज्बात।

विशाल बत्रा ने बताया, "पिछले 20 साल में अगर मैंने कोई सपना देखा था तो वो था बत्रा टॉप पर जाना। कई बार मैंने अपनी ये ख्वाहिश विक्रम के ऑफिसर्स से साझा की। ले. जनरल वाईके जोशी जो करगिल युद्ध के वक्त विक्रम के कमांडिंग ऑफिसर थे, इन दिनों सेना की 14 वीं कोर के जीओसी हैं। उन्हीं के इलाके में करगिल भी आता है। उनकी बदौलत इस साल मेरा यह सपना पूरा हुआ। वैसे मैं खुद चढ़ाई करके बत्रा टॉप तक जाना चाहता था। लेकिन, दिक्कतों के चलते उन्होंने मुझे एयरड्रॉप करने का फैसला किया। बत्रा टॉप से 100 मीटर दूर एक समतल जगह पर हमारा चॉपर उतरा। पिछली पूरी रात मैं इसी एक्साइटमेंट में सो नहीं पाया था कि अगले दिन मैं बत्रा टॉप जाने वाला हूं। हम 15 लोग थे। सभी 20 साल बाद उस चोटी पर जा रहे थे। इनमें वे सैनिक थे, जिन्होंने विक्रम के साथ मिलकर उस चोटी को दुश्मनों से छुड़वाया था।"

उसे किस जगह पर गोली लगी थी?

"चॉपर से पहला पैर नीचे रखा ही था कि भीतर कई सवाल कुनमुनाने लगे। विक्रम कहां खड़ा था, किस किनारे से बंकर पर छलांग लगाई थी, कहां से उसने आमने-सामने की लड़ाई में तीन पाकिस्तानियों को मार गिराया था? कितने बंकर थे? कितनी गोलियां चली थींं? उसे किस जगह पर गोली लगी थी? कहां आिखरी सांस ली थी...? मैं बस पूछे ही जा रहा था। पहले भी कितनी बार विक्रम की लड़ाई के बारे में पूछ और सुन चुका था। लेकिन, वहां अपनी आंखों से देखा तो लगा सबकुछ पहली बार ही मालूम हो रहा है।"

आज भी विक्रम उन चोटियों की रक्षा कर रहा है
विशाल नेबताया,"26 जून 1999 को विक्रम ने आखिरी बार मम्मी-पापा से सैटेलाइन फोन से बात की थी। चहकते हुए उसने बताया था कि कैसे सेना ने पाइंट 5140 चोटी दुश्मन से छुड़वा ली है। कुछ दिन बाद वह अपने अगले मिशन पर निकल पड़ा। पाइंट 4875 को जीतने के इस मिशन के लिए 5 जुलाई 1999 को उसकी टीम ने चढ़ाई शुरू की थी। 7 जुलाई 1999 को इस चोटी पर तिरंगा फहराया जा चुका था। विक्रम इसी दिन शहीद हुआ था। यह चोटी आज बत्रा टॉप है। 20 साल बाद 7 जुलाई 2019 को मैंने इसी जगह से मम्मी-पापा को फोन किया। फोन उठाते ही पापा ने पूछा कहां हो? मैंने जवाब दिया, बत्रा टॉप से बोल रहा हूं। काश ये फोन विक्रम ने किया होता। मुझे हमेशा लगता है कि काश विक्रम अपनी कहानियां सुनने और सुनाने के लिए खुद आज होता। यहां आने से पहले मेरे मन में बस यही चल रहा था कि विक्रम मुझे बुला रहा है। और मैं उससे मिलने जा रहा हूं। किसी ने पूछा तो मैंने यही कहा, 'आई एम विजिटिंग विक्रम'। मैं अपने साथ अगरबत्ती और धूप लेकर गया था। विक्रम और उन बाकी शहीदों को श्रद्धांजलि देने। वह इलाका आज भी मेरे भाई की वीरता की खुशबू से महक रहा है। मुझे महसूस हुआ, आज भी विक्रम उन चोटियों की रक्षा कर रहा है।"

मैं विक्रम को महसूस करना चाहता था
"मुझे तो वहां एयरड्रॉप किया गया। लेकिन, 17 हजार फीट की ऊंचाई पर इन चोटियों तक आम लोगों का पहुंच पाना असंभव है। मुझे हर दूसरे कदम पर रुककर सांस लेनी पड़ रही थी। 20 साल पहले, गोलीबारी के बीच रात के घुप्प अंधेरे में जो यहां पहुंचे होंगे, वो जरूर ही किसी दैवीय शक्ति की बदौलत ऐसा कर पाए होंगे। वरना इस ऊंचाई पर पत्थर भी गिरे तो ग्रेनेड सी चोट देगा। पाकिस्तानी उसे शेरशाह कहते थे। कोई शेर ही ये काम कर सकता था। बत्रा टॉप पहुंचकर मैं कुछ देर अकेले चुपचाप एक कोने में खड़ा रहा। मैं विक्रम को महसूस करना चाहता था। उन पत्थरों को छूकर देखा, जिन पत्थरों ने 20 साल पहले मेरे भाई को छुआ होगा। उस वक्त जब उसकी सांसें चल रही होंगी। उस वक्त जब वह इस चोटी पर तिरंगा फहरा रहा होगा। मैं वहां जोर-जोर से रोना चाहता था। लेकिन, मैं नहीं रोया, क्योंकि वहां मेरा भाई हंसते-हंसते लड़ा था। अपने आखिरी वीडियो में भी हंसते हुए नजर आ रहा है। जब तिरंगे में लिपटा घर पहुंचा तो ताबूत में भी चेहरा मुस्कुराता हुआ था। फिर उससे मिलकर मैं कैसे रोता? मैं 17 हजार फीट की ऊंचाई पर उस चोटी को बस छूकर नहीं लौटा। कम ऑक्सीजन और बर्फ से ढकी चोटियों के बीच 2 घंटे रुककर मैंने विक्रम को महसूस किया। उससे बातें कीं। विक्रम को खुद के भीतर भरकर लौटा हूं। सब चार धाम की यात्रा करना चाहते हैं। मेरे लिए बत्रा टॉप ही चार धाम थे।"



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विशाल बत्रा (परमवीर चक्र कैप्टन विक्रम बत्रा के जुड़वां भाई)।
शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा परमवीर चक्र।

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