चंद्रयान-2 का ऑर्बिटर मंगलयान में परखा गया, लैंडर के लिए चांद जैसी मिट्टी धरती पर तलाशी गई
आदित्या लोक, स्पेशल करोस्पोंडेंट:
नई दिल्ली. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र (इसरो) का चंद्रयान-2 मिशन मुश्किल हालात से लड़ने की कहानी है। 2008 में जब चंद्रयान-2 प्रोजेक्ट मंजूर हुआ, तब यह तय हुआ कि रूस इस मिशन के लिए लैंडर और रोवर देगा। लेकिन 2013 में जब रूस ने इससे इनकार कर दिया, तब तक इसरो ऑर्बिटर तैयार कर चुका था। ऑर्बिटर यानी यान का वह हिस्सा, जो पृथ्वी और चंद्रमा की कक्षा का चक्कर लगा सके और चांद की सतह पर लैंडिंग कर सके। दिलचस्प बात यह है कि इसरो ने तब ऑर्बिटर में कुछ बदलाव कर 2013 के मंगलयान मिशन में इसका इस्तेमाल किया। इस तरह चंद्रयान-2 के सबसे अहम हिस्से की लाइव टेस्टिंग 6 साल पहले ही हो चुकी थी। चंद्रयान-1 और चंद्रयान-2 के प्रोजेक्ट व प्रोग्राम डायरेक्टर रहे और अब इसरो से रिटायर हो चुके साइंटिस्ट डॉ. एम अन्नादुरई ने भास्कर एप से बातचीत में इस मिशन कई अहम बातें बताईं।
चंद्रयान-2 के लिए बना ऑर्बिटर ज्यादा दिनों तक यूं ही नहीं रख सकते थे
डॉ. अन्नादुरई बताते हैं कि चंद्रयान-2 के लिए हमने रूस की स्पेस एजेंसी रोस्कोस्मोस के साथ समझौता किया था। ऑर्बिटर बनाने की जिम्मेदारी इसरो के पास थी, जबकि लैंडर और रोवर रूस को बनाना था। मिशन को 4 से 5 साल में पूरा करना था। लेकिन इसी बीच मंगल ग्रह के एक चंद्रमा पर भेजा जा रहा रूस का मिशन फेल हो गया। तकनीकी दिक्कतों के चलते जब रूस ने लैंडर और रोवर देने से मना कर दिया तो हम समझ गए कि हमें इस मिशन में 4 से 5 साल का वक्त और लगेगा। हम ऑर्बिटर बना चुके थे। हमारे सामने एक चुनौती यह थी कि हम इसे ज्यादा समय तक नहीं रख सकते थे। इसलिए हमने चंद्रयान-2 के ऑर्बिटर में कुछ बदलाव किए और इसे मंगलयान मिशन के लिए तैयार किया। इसी ऑर्बिटर को हमने मंगलयान मिशन में लॉन्च किया।
धरती पर चांद जैसा माहौल तैयार करना था
डॉ. अन्नादुरई कहते हैं कि लैंडर के लिए हमें थ्रस्टर्स और अल्टीमेटर, ओरिएंट अल्टीमेटर और एक्सेलेरोमीटर जैसे सेंसर बनाने थे। यह सब चीजें हमें नए सिरे से बनानी थी और इसकी टेस्टिंग भी करनी थी। हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती टेस्टिंग करना ही थी क्योंकि हमें धरती पर रहकर चांद जैसा माहौल तैयार करना था। यह सब हम पहली बार कर रहे थे। हमने लैंडिंग के लिए एक ऐसी जगह (दक्षिणी ध्रुव) चुनी थी, जहां आज तक कोई नहीं गया है। इसलिए लैंडर की सॉफ्ट लैंडिंग के लिए हमने चंद्रयान-1 और बाकी दूसरी जगहों से डेटा जुटाया। इस डेटा के आधार पर हमने चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव जैसी साइट को धरती पर ही बनाया और टेस्टिंग की।
सबसे बड़ी चुनौती लैंडर की थी, इसकी टेस्टिंग के लिए चंद्रमा जैसी 70 टन मिट्टी जरूरी थी
पूर्व प्रोजेक्ट डायरेक्टर अन्नादुरई बताते हैं कि हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती लैंडर बनाने की थी, क्योंकि ऑर्बिटर हम पहले ही बना चुके थे और उसे मंगलयान में भेजा भी जा चुका था, जो सफल हुआ था। इसलिए हमें वही काम दोबारा करना था। हालांकि, इसके बाद भी हमें सब कुछ स्वदेशी तकनीक पर ही बनाना था। हमें 70 टन मिट्टी की जरूरत थी। तमिलनाडु के सालेम में एनॉर्थोसाइट नाम की चट्टानें हैं, जो चांद पर मौजूद चट्टानों से मेल खाती हैं। वैज्ञानिकों ने उन चट्टानों को पीसकर चंद्रमा जैसी मिट्टी बना दी। वहां से इस मिट्टी को इसरो सैटेलाइट इंटीग्रेशन एंड टेस्टिंग एस्टेब्लिशमेंट बेंगलुरू लाई गई और वहां दो मीटर मोटी सतह बनाई गई। उस मिट्टी पर लैंडर की पिछले चार साल में हजारों बार लैंडिंग कराई गई।
चंद्रयान-2 का वजन ज्यादा था, इसलिए 10 साल लगे
अन्नादुरई कहते हैं- हमने चंद्रयान-1 के लिए जो पेलोड और इंस्ट्रूमेंट्स बनाए थे, वो भी स्वदेशी ही थे। लेकिन, चंद्रयान-2 के लिए हमें पहले से ज्यादा बेहतर पेलोड और इंस्ट्रूमेट्स की जरूरत थी। रोवर बनाने में हमें ज्यादा दिक्कत नहीं आई। लेकिन, चंद्रयान-2 के साथ जो पेलोड जा रहे थे, हम उसका वजन ज्यादा नहीं रख सकते थे। रूस के मना करने की वजह से इस मिशन को लॉन्च होने में 10 साल से ज्यादा का वक्त लग गया। चंद्रयान-2 का वजन चंद्रयान-1 की तुलना में कहीं ज्यादा था, इसलिए इसे ले जाने के लिए जीएसएलवी मार्क-II सक्षम नहीं था, इसलिए हमने जीएसएलवी मार्क-III का इस्तेमाल किया। हम पहले भी स्वदेशी तकनीक पर आधारित पीएसएलवी और जीएसएलवी बना चुके थे। इससे पहले हमने जो चंद्रयान-1 भेजा, वह भी स्वदेशी तकनीक से ही तैयार किया गया था। इसलिए हमें मालूम तो था कि हमें ही अब बनाना है। लेकिन, कम बजट और कम समय में यह सब तैयार करना एक बड़ी चुनौती थी।
हर कोई मिशन का हिस्सा बनना चाहता था, लेकिन युवाओं को तरजीह दी गई
अन्नादुरई कहते हैं कि हमारे पास चंद्रयान-1 और मंगलयान का अनुभव था। इससे हमें काफी मदद मिली। चंद्रयान-2 मिशन बहुत रोचक और चुनौतीभरा था, इसलिए हर कोई इस मिशन में काम करना और इसका हिस्सा बनना चाहता था। दूसरे मिशन की तुलना में इस मिशन के लिए ज्यादा समय चाहिए था। इसलिए युवाओं को रखा गया क्योंकि वे अपना ज्यादा वक्त दे सकते थे। यह दुनिया का पहला मिशन था, जिसमें कोई यान चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरने वाला था। इसलिए इस मिशन को सफल बनाने के लिए सभी ने बहुत मेहनत की। हमारी मेहनत कितनी है, इसका अंदाजा हमारे परिवारों को भी रहे, इसके लिए न सिर्फ डायरेक्टर, बल्कि इस मिशन से जुड़े सभी लोग साइंस डे, टेक्नोलॉजी डे, मदर्स डे पर अपने परिवार वालों को लेकर आते थे और अपना काम दिखाते थे कि वे किस मिशन पर काम कर रहे हैं। सबको अपनी जिम्मेदारी अच्छे से पता थी और सब जानते थे कि उन्हें क्या करना है?
इस कामयाबी से स्पेस टेक्नोलॉजी में भारत ब्रांड नेम बन जाएगा
अन्नादुरई के मुताबिक, चंद्रयान-2 की कामयाबी से सबसे बड़ा फायदा भारत को होगा। इससे हमें इतना पर्याप्त डेटा और जानकारी मिल जाएगी जिससे हमें दक्षिणी ध्रुव पर इंसान को भेजने में मदद मिलेगी। मिशन की कामयाबी से अंतरिक्ष विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में युवाओं का रूझान बढ़ेगा। इसकी कामयाबी से हमें आगे सैटेलाइट, स्पेस मिशन या चंद्र मिशन लॉन्च करने में भी मदद मिलेगी। अंतरिक्ष के क्षेत्र में भारत भी एक 'ब्रांड नेम' बन जाएगा। अभी भारत इंटरनेशन स्पेस स्टेशन का हिस्सा नहीं है, लेकिन हो सकता है कि इस मिशन की बदौलत हम उसका हिस्सा भी बन जाएं।
नासा का 2024 का मिशन भी हमारी कामयाबी पर टिका है
अन्नादुरई कहते हैं कि चंद्रयान-2 मिशन से हमें जो भी डेटा और जानकारी मिलेगी, वह नासा के 2024 में भेजे जाने वाले मैन मिशन के लिए बहुत उपयोगी साबित होगी। चंद्रयान-2 से नासा को पता चल सकेगा कि चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर इंसान को भेजना कितना आसान है? क्या-क्या चुनौतियां आ सकती हैं? दक्षिणी ध्रुव में कौन-सी जगह सही है जहां इंसान को भेजा जा सकता है। चंद्रयान-2 की कामयाबी नासा के इस मिशन के लिए बहुत महत्वपूर्ण होगी।
14 नवंबर 2007 को इसरो और रूस के बीच समझौता हुआ
14 नवंबर 2007 को इसरो और रूस की स्पेस एजेंसी रोस्कोस्मोस के बीच चंद्रयान-2 को लेकर समझौता हुआ था। इस समझौते के तहत इसरो की जिम्मेदारी ऑर्बिटर बनाने की थी, जबकि रोस्कोस्मोस के पास लैंडर और रोवर बनाने का काम था। इस समझौते के करीब एक साल बाद 18 सितंबर 2008 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने चंद्रयान-2 को मंजूरी दी। ऐसा कहा जाता है कि पहले इस मिशन को 2013 में ही लॉन्च करने की तैयारी थी, लेकिन रूस की देरी के चलते इसे उस वक्त लॉन्च नहीं किया गया। आखिरकार 2015 में रूस ने इस मिशन से हाथ खींच लिए, जिसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस प्रोजेक्ट को पूरी तरह स्वदेशी बनाने की मंजूरी दी।
चार बार टली लॉन्चिंग
चंद्रयान-2 की लॉन्चिंग चार बार टाली भी गई। इसे पहले अक्टूबर 2018 में लॉन्च किया जाना था, लेकिन बाद में इसकी तारीख बढ़ाकर 3 जनवरी और फिर 31 जनवरी कर दी गई। बाद में अन्य कारणों से इसे 15 जुलाई तक टाल दिया गया। लेकिन 15 जुलाई को भी तकनीकी खामी की वजह से मिशन को लॉन्चिंग से 56 मिनट पहले टाल दिया गया। आखिरकार इसे 22 जुलाई की दोपहर 2:43 बजे इसरो के बाहुबली रॉकेट कहे जाने वाले जीएसएलवी मार्क-3 से लॉन्च किया गया।
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