करगिल-संसद हमले के बावजूद भारत और पाक के अफसर 350 बार मिले

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नई दिल्ली/जम्मू कश्मीर.पूर्व प्रधानमंत्री अटलजी के कूटनीतिक प्रयासों से 2000 के दशक में हम दो बार कश्मीर समस्या सुलझाने के करीब पहुंचे। उन्होंने कंधार प्लेन हाइजैक, करगिल, संसद हमले के बावजूद हर स्तर पर वार्ता जारीरखी। 2001 में भारत-पाक के बीच रिकॉर्ड 77 वार्ता हुईं। 1999-2007 के बीच दोनों देश के अफसर 350 बार मिले। इस दौर के प्रयासों को गोल्डन एरा ऑफ इंडिया-पाक एफर्ट फॉर कश्मीर प्रॉब्लम कहा जाता है। वहीं, बीते 5 साल में एक भी स्ट्रक्चर्ड कंपोजिट डायलॉग नहीं हुआ। वैश्विक दबाव बना पाक को अलग-थलग करने की नीति अपनाई।


एक्सपर्ट्स कहते हैं कश्मीर की सबसे बड़ी दिक्कत है, वहां के राजनीतिक और प्रशासनिक सिस्टम का काम नहीं करना। वहां कई इलाके ऐसे हैं जहां आज तक कोई अधिकारी, नेता और तहसीलदार स्तर के अफसर भी नहीं पहुंचे हैं। इसका फायदा उठाकर अलगाववादी युवाओं को बहकाते हैं। घाटी के नेताओं को लगता है कि यहां विकास की जिम्मेदारी सेना की है। पर सेना का काम शांति स्थापित करना है। नाकि विकास करना।

2003 में हुई थीसीजफायर की घोषणा
कश्मीर में कई मौके आए, जब हिंसा में भारी गिरावट देखी गई। टूरिस्ट आने लगे, अमरनाथ यात्रा हुई। पर सरकारों ने इसे ही कश्मीर मसले का सुलझ जाना समझ लिया। मसलन 2003 कश्मीर के लिए बड़ा बदलाव था। उस वक्त पाकिस्तान के साथ सीजफायर की घोषणा हुई थी। तब से लेकर 2008 में अमरनाथ भूमि विवाद तक हालात सामान्य रहे। उसके बाद कट्टरपंथी सलाफी-वहाबी संप्रदाय की मस्जिदें बढ़ती गईंं। एक दशक में ही यह 600 से 3000 हो गई। पर इसे रोका नहीं गया।

आईएसआई ने सोशल मीडियाके जरिए आतंकीतैयार किए
2015 की बात करें तो आईएसआई ने सोशल मीडिया के जरिए आतंकी हीरो तैयार करना शुरू किया। पत्थरबाजी के लिए लोगों को भड़काया। लोगों को सेना के खिलाफ किया। बुरहान वानी तैयार हुआ। लेकिन सरकार ने इसे नहीं रोका। कश्मीर की सरकारें मसला हल करने की बजाए राजनीति करने और जिम्मेदारी ढोलने का काम करती हैं। लेकिन हल क्या होगा इसके लिए कोई कुछ नहीं करना चाहता। इस रवैय्ये को अब बदलने की जरूरत है।

4डी फॉर्मूले की जरूरत:4डी यानी डायलॉग, डेवलपमेंट, डिप्लोमेसी और डिफेंस के तालमेल से ही कश्मीर घाटी में शांति बहाली संभव है।

1) डायलॉग

  • भारत-पाक वार्ता से पहले दिल्ली-कश्मीर में निरंतर चर्चा जरूरी :कश्मीर समस्या हल करने में अटल की कूटनीति अब भी मौजूदहै। उन्होंने पहली बार सैन्य ताकतों की बजाय 80% तक फोकस कूटनीतिक और राजनीतिक तरीकों पर किया। टॉक बिटवीन टेरर फॉर्मूला यानी युद्ध और बातचीत दोनों साथ-साथ जारी रखी। बातचीत का यह प्रयास हर मोर्चे पर होना चाहिए। मसलन, नई दिल्ली-इस्लामाबाद, नई दिल्ली-कश्मीर के बीच निरंतर प्रभावी डायलॉग बना रहना चाहिए। संवाद में कमी की वजह से ही आतंक को जगह मिलती है।

2) डेवलपमेंट

  • बेरोजगारी का फायदा उठा लोगों के हाथों में बंदूकें थमाई जा रहीं :घाटी में आर्थिक-सामाजिक पहलुओं पर ज्यादातर सरकारों ने ध्यान नहीं दिया। यहीवजह है कि राज्य में बेरोजगारी दर 21% से ज्यादा है, जो देश में त्रिपुरा के बाद सबसे अधिक है। यहां 3866 लोगों पर महज एक डॉक्टर है। जबकि देश में 2000 लोगों पर एक डॉक्टर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, प्रति हजार लोगों पर एक डॉक्टर होना चाहिए। राज्य में 23,771 में से 76% स्कूलों में बिजली तक नहीं है। बिना बिजली वाले स्कूलों के मामले में जम्मू-कश्मीर देश के 36 राज्यों में 31वें नंबर पर है। इन्हीं पिछड़ेपन की वजह से अलगाववादी युवाओं को आतंक से जोड़ने में सफल होते हैं।

3) डिफेंस

  • इजरायली मॉडल अपनाएं ताकि आतंकी हमला करने की सोचें भी नहीं:कश्मीर में सेना का अहम रोल है। सेना ने 1971 की जंग में इस समस्या के हल का सबसे मजबूत मौका दिया था। पर राजनीतिक सुस्ती ने इसे गवांदिया। सेना को और ताकत देने के लिए अब हमें जरूरत है इजरायल मॉडल की तरह सैन्य टेक्नोलॉजी पर ध्यान देने की। इस मॉडल में इजरायल जैसा एक छोटा सा देश अपनी सैन्य टेक्नोलॉजी को हथियार बनाए हुए है। इस सैन्य टेक्नोलॉजी के डर से आतंकी यहां कुछ भी गलत करने से पहले हजार बार सोचते हैं। यह फायदा हमें भी मिल सकता है। इन सबके बीच एक फोकस कश्मीर के लोगों और सेना के बीच के संबंधों की बेहतरी पर भी हो।

4. डिप्लोमेसी

  • 72 साल में इसी के जरिए सबसे ज्यादा बार बात बनती दिखी है:डिप्लोमेसी के दम पर ही पिछले दशक में दो बार हम कश्मीर समस्या सुलझाने के करीब पहुंच गए थे,लेकिन मौजूदा सरकार में दोनों देशों के बीच एक भी स्ट्रक्चर्ड कम्पोजिट डायलॉग नहीं हुआ। जबकि अटलजी शांति वार्ता न रुकने के पक्षधर थे। उनका एक ही मकसद रहा कि आतंकी हमलों के बीच भी शांति वार्ता और डिप्लोमेसी न रुकने पाए। मौजूदा सरकार सीधे बातचीत की डिप्लोमेसी की जगह दूसरे देशों को साथ लाकर पाकिस्तान को अलग-थलग करने की कोशिश कर रही है। लेकिन इसके साथ ही हमें दोनों देशों के बीच भी निरंतर डिप्लोमेसी जारी रखनी होगी।

शांति का अटल फॉर्मूला :2001 में अटलजी और पाकिस्तानी राष्ट्रपति मुशर्रफ ने 4 सूत्री कश्मीर फॉर्मूला दिया था। एक्सपर्ट इसे अब तक का सबसे कारगर तरीका मानते हैं।भारत-पाकिस्तान के रिटायर्ड अफसरों के बीच करीब हर साल होने वाली ट्रैक-2 वार्ता में इसे अपनाने की मांग उठती है। ये वार्ता किसी तीसरे देश में होती है। यह फॉर्मूला है-

ट्रैक-2 वार्ता में पाक अटल के फॉर्मूले को उठाता रहा है :

1. चरणबद्ध तरीके से दोनों देश एलओसी से सेना कम करेंे।

2. जम्मू-कश्मीर की सीमा में बदलाव नहीं हो। यहां के लोगों को नियंत्रण रेखा के आर-पार जाने का हक हो।
3. जम्मू-कश्मीर को स्वशासन की स्वयत्तता मिले।
4. जम्मू-कश्मीर की देखरेख भारत, पाक और कश्मीर को मिलाकर बना एक संयुक्त तंत्र करे।

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अभी तक जो खेल होता रहा, मौत का... खून का...वो बंद होना चाहिए। बंदूक से मसले हल नहीं होंगे, बंदूक से आदमी को मारा जा सकता है लेकिन बंदूक से उसकी भूख नहीं मिट सकती। -अटल बिहारी वाजपेयी

राष्ट्राध्यक्ष से लेकर अफसर स्तर तक हुई इन वार्ता से हम कश्मीर समस्या हल करने के सबसे करीब थे

बात बनते-बनते बिगड़ी:3 मौके जब हम कश्मीर समस्या हल करने के सबसे करीब थे

  • 1971: भारत-पाकिस्तान युद्ध में हमारी जीत हुई। पाकिस्तान के 93 हजार कैदी कब्जे में थे। दबाव डालकर कश्मीर समस्या सुलझाने का यह सुनहरा मौका था पर राजनीतिक चूक के चलते यह खो दिया।
  • 2001-04: 2001 में आगरा वार्ता और फिर 2004 में इस्लामाबाद वार्ता के समय। इस दौरान दोनों देशों के मुखिया सीधे शांति बहाली के पक्ष में एक टेबल पर थे। लेकिन पहले हुरियत नेताओं के चलते और दोबारा सरकार बदलने से फिर हम चूक गए।
  • 2007-08: 2004 के प्रयासों के क्रम में शांति वार्ता पर सहमति बन गई थी। लेकिन तभी परवेज मुशर्रफ का तख्ता पलट हो गया। पहले उन्हें सेना प्रमुख पद से हटाया गया। फिर राष्ट्रपति की गद्दी से। आखिरी के दोनों मौकों में मुशर्रफ ही पाक सेना प्रमुख और राष्ट्रपति थे। यही इसकी सबसे अच्छी बात थी। इन दाेनों ही प्रयासों को गोल्डन एरा ऑफ इंडिया-पाक एफर्ट फॉर कश्मीर प्रॉब्लम कहा जाता है।

तीन दशक में सरकारों ने भारत-पाक वार्ता का नाम तीन बार बदला :पिछले 3 दशकों में भारत-पाकिस्तान शांति वार्ता के नाम तीन बार बदले जा चुके हैं। पहली बार 2000 के दशक की शुरुआत में अटलजी के समय में इस वार्ता को कम्पोजिट डायलॉग का नाम दिया गया। फिर 2012 में इसका नाम बदलकर रिज्यूम्ड डायलॉग हो गया। मौजूदा सरकार ने इसी वार्ता को कॉम्प्रिहेंसिव बायलेट्रल डायलॉग का नाम दिया। हर नई सरकार ने अपनी सुविधा के हिसाब से इस बातचीत का नाम बदला। इन सारे नामों में वार्ता का स्वरूप लगभग एक सा रहा। हालांकि, 2012 में रिज्यूम्ड डायलॉग के दौरान भारतीय सुरक्षा सलाहकार को भी प्रमुख तौर पर इस बातचीत में शामिल किया जाने लगा।

कश्मीर में आतंक से निपटने के लिए तीन दशकों में कूटनीतिक, राजनीतिक और सैन्य स्तर पर किए गए प्रयास

1989-99का दशकगवर्नर शासन और सैन्य ऑपरेशन से आतंक पर सख्ती की, शांति बहाली के लिए कूटनीतिक रास्ता अपनाया

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  • 1990 में जगमोहन की जगह रॉ प्रमुख रहे गिरीशचंद्र गवर्नर बने। खुफिया तंत्र बनाया। आतंक को सख्ती से कुचला। उनके बाद पूर्व सेनाध्यक्ष कृष्णाराव गवर्नर बने।
  • 1994 में शांति बहाली के लिए अलगाववादी नेता रिहा किए गए। 1996 में फिर चुनाव हुए। विकास व आर्थिक पैकेज से लोगों को जोड़ने की कवायदें।

हासिल: इस दशक में 40 हजार आतंकी घटनाओं में 8996 लोग मारे गए। 2517 जवान शहीद हुए। सेना ने 14,069 आतंकी ढेर किए।

1999-2009का दशकअटल टॉक बिटवीन टेरर फॉर्मूले पर आगे बढ़े, 56 साल में पहली बार पूरे बॉर्डर पर एकतरफा संघर्ष विराम हुआ

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  • प्रधानमंत्री वाजपेयी टॉक बिटवीन टेरर फॉर्मूले पर चले। पहली बार युद्ध-बातचीत दोनों साथ-साथ की। यूपीए-1 में यही मॉडल जारी रहा। मुंबई हमले के बाद वार्ता रद्द हुई।
  • करगिल युद्ध, संसद हमला और अक्षरधाम जैसे हमलों के बीच 350 बार दोनों देशों के टॉप अधिकारी मिले। सबसे ज्यादा 77 मुलाकातें 2001 में हुईं।

हासिल: 20 हजार आतंकी घटनाएं हुईं। इनमें 4,826 लोग मारे गए। 2,242 जवान शहीद हुए। 10,590 आतंकी मारे गए।

2009से अबतकआतंक पर सख्ती के साथ विकास के एजेंडे पर चले मस्कुलर पॉलिसी अपनाई, बातचीत का दायरा घटा

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  • यूपीए-2 में गोलमेज सम्मेलन हुए। पर अलगावादियों ने बॉयकाट किया। मोदी ने विकास के एजेंडे को बढ़ाया। घाटी में 68 हजार करोड़ रु. के 28 बड़े प्रोजेक्ट शुरू किए।
  • बात नहीं बनने पर मस्कुलर पॉलिसी अपनाई और रणनीतिक बातचीत बंद की। पाक-हुर्रियत नेताओं के मिलने पर भारत-पाक सचिव स्तर की बैठक रद्द की।

हासिल: 2017 में 126 और 2018 में 130 स्थानीय युवा आतंकी बने। 2010-13 के बीच यह आंकड़ा क्रमश: 54, 23, 21 और छह था।



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