1971 में हमने रिहा किए पाक के 93 हजार युद्धबंदी, हमारे 54 सैनिक अब भी पाकिस्तानी जेलों में

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भारत के विंग कमांडर अभिनंदन की रिहाई के बाद एक बार फिर 1971 से पाकिस्तानी जेलों में कैद भारतीय सैनिकों की रिहाई की मांग उठने लगी है। पाकिस्तान उनके अस्तित्व से इंकार करता रहा है, लेकिन 54 युद्धबंदियों के परिवारों को अब भी उम्मीद है कि उनके परिवार के वीर जिंदा हैं और वापसी कर सकते हैं।

भारतीय वायु सेना के विंग कमांडर अभिनंदन वर्तमान को तीन दिन तक युद्धबंदी बनाए रखने के बाद पाकिस्तान ने रिहा कर दिया। उनकी रिहाई के बाद 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान युद्धबंदी बनाए गए भारतीय सैनिकों की रिहाई की को लेकर भी चर्चाएं होने लगी है। माना जाता है कि 54 भारतीय सैनिक आज भी पाकिस्तानी जेलों में कैद हैं। इन्हें 'मिसिंग 54' कहा जाता है। भारत लंबे समय से इन्हें रिहा करने की मांग करता रहा है। वहीं इसे लेकर पाकिस्तान का रुख आज भी स्पष्ट नहीं है। अभिनंदन की रिहाई के बाद शुक्रवार को पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने एक बार फिर 1971 के युद्धबंदियों को रिहा करने की मांग की है।


वहीं 1971 के ही युद्ध में भारत ने पाकिस्तान के 90,000 से 93,000 सैनिकों और नागरिकों को गिरफ्तार किया था। इनमें करीब 81 हजार पाकिस्तानी सैनिक थे और करीब 12 हजार नागरिक थे। अगस्त, 1972 यानी युद्ध के 8 महीने बाद शिमला समझौते के तहत इन पाकिस्तानी युद्धबंदियों को रिहा कर दिया गया। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के इस फैसले की काफी आलोचना भी हुई। कई लोगों का मानना था कि ऐसा कर इंदिरा गांधी ने पाकिस्तान के साथ भारत की शर्तों पर कश्मीर समस्या सुलझाने का मौका गंवा दिया।


मिसिंग डिफेंस पर्सनल रिलेटिव्स एसोसिएशन (एमडीपीआरए) की सदस्य सिम्मी वराइच कहती हैं कि लापता सैनिकों के परिवार लंबे समय से संघर्ष कर रहे हैं। सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन कोई प्रगति नहीं होती। सिम्मी चाहती हैं कि सरकार इस दिशा में ठोस कदम उठाए और मिसिंग 54 की स्थिति स्पष्ट कर परिवारों को जानकारी दी जाए।

हमारे पास ढेरों सबूत

किताबों, अखबारों, रेडियो से मिले कई सबूत :सबसे पहले यह मामला तब सामने आया था जब 1974 में मेजर अशोक सूरी का एक खत पाकिस्तान से आया, जिसमें उन्होंने अपने जिंदा होने का जिक्र किया था। जबकि सेना उन्हें 'किल्ड इन एक्शन' घोषित कर चुकी थी। इसके बाद भी 1975 में कराची से एक पोस्टकार्ड आया जिसमें उन्होंने 20 अन्य भारतीय सैन्य अधिकारियों के बारे में लिखा था। इसके अलावा भी कई सबूत समय-समय पर सामने आते रहे हैं। उदाहरण के लिए बीबीसी लंदन की वरिष्ठ पत्रकार विक्टोरिया शॉफील्ड की 1980 में आई किताब 'भुट्‌टो-ट्रायल एंड एक्जीक्यूशन' में ऐसी जेल का जिक्र था, जिसमें भारतीय युद्धबंदी कैद थे।

इसी तरह टाइम न्यूजपेपर में दिसंबर 1971 में पाकिस्तान की जेल में कैद एक व्यक्ति की तस्वीर छपी। मेजर ए.के. घोष के परिवार ने दावा किया कि यह उनकी तस्वीर है। पाकिस्तानी अखबारों में भी पाक जेल मंे कैद भारतीय सैनिक की तस्वीर छपी। पाकिस्तानी रेडियो पर भी भारतीय सैनिकों के वहां होने की बात सुनी गई।

1983 में पाक सरकार ने लापता सैनिकों के परिवार को जेलों में जाकर अपने सैनिकों को पहचानने का मौका देने के लिए पाकिस्तान बुलाया था। लेकिन यह पाक की नौटंकी साबित हुई। सिम्मी बताती हैं कि 2012 में ओमान मंे काम कर रहे भारतीय कारपेंटर ने दावा किया कि उसे एक सिख व्यक्ति मिला जिसका दावा था कि वह सिपाही जसपाल सिंह है और ओमान जेल में चार भारतीय युद्धबंदी कैद में हैं। इस तरह के सबूतों की लंबी फेहरिस्त मौजूद है।

कौन हैं 'मिसिंग 54'?

सरकार को भी नहीं पता कि जिंदा हैं या नहीं :भारतीय सशस्त्र सेना के 54 सैनिकों और अधिकारियों को 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद 'मिसिंग इन एक्शन' (लापता) या 'किल्ड इन एक्शन' (मृत) घोषित किया गया था। लेकिन माना जाता है कि ये अब भी जिंदा हैं और पाकिस्तान की अलग-अलग जेलों में कैद हैं। इसमें 30 सैनिक थल सेना के और 24 वायु सेना से हैं। इन्हें वेस्टर्न फ्रंट पर लड़ते हुए गिरफ्तार किया गया था। शिमला समझौते के तहत 93,000 पाकिस्तानी सैनिक वापस भेजने के बावजूद सरकार ने इन 54 भारतीय सैनिकों को लेकर कोई समझौता नहीं किया था।

एमडीपीआरए की सदस्य सिम्मी वराइच बताती हैं कि युद्धबंदियों को परिभाषित करने के लिए देश में अलग-अलग श्रेणियां नहीं हैं, जैसी कि दूसरे देशों में होती हैं। कई मामलों में पहले सरकार की चिट्‌ठी आई कि सैनिक 'मिसिंग इन एक्शन' है। फिर कुछ समय बाद एक और चिट्ठी आई जिसमें बताया गया कि वही सैनिक अब 'किल्ड इन एक्शन' है। लेकिन कैसे, इसकी जानकारी नहीं दी गई। सरकार ने न तो सैनिकों को ढूंढने की कोशिश की, और न ही इस बात की कोशिश की कि अगर वे मारे गए हैं, तो उनके अवशेष लाएं।

अब तक क्या हुआ?

भुट्टो ने मानी मौजूदगी, मुशर्रफ ने खारिज की :भारतीय अथॉरिटीज को भारतीय युद्धबंदियों की सूची जारी करने में ही 7 साल का वक्त लग गया। सिम्मी वराइच के अनुसार 1979 में तत्कालीन विदेश मंत्री समरेंद्र कुंडु ने भी 40 ऐसे सैनिकों की सूची लोक सभा में रखी थी। इसमें उन जेलों का भी उल्लेख था, जहां ये सैनिक रखे गए थे। बाद में सूची में 14 नाम और जुड़े लेकिन कभी स्थिति स्पष्ट नहीं की गई। 1989 तक पाकिस्तान वहां किसी भी युद्धबंदी के होने से इनकार करता रहा। फिर प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्‌टो ने माना कि पाक की जेलों में भारतीय सैनिक हैं।

इस्लामाबाद में दिसंबर 1989 में भुट्‌टो और राजीव गांधी की मुलाकात में भी इस विषय पर बात हुई। लेकिन कई साल बाद, पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने किसी भी युद्धबंदी के वहां होने की बात को सिरे से खारिज कर दिया। तब से समय-समय पर 'मिसिंग 54' को भारत वापस लाने की बेनतीजा बातें होती रही हैं। 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने भी केंद्र से पूछा कि क्या 54 भारतीय युद्धबंदी अब भी ज़िंदा हैं। तब सरकार की तरफ से जवाब आया, 'हम नहीं जानते। हमें लगता है कि वे अब जिंदा नहीं हैं, क्योंकि पाकिस्तान अपनी जेलों में उनके होने से इनकार करता रहा है।'

अभी क्या स्थिति है?

संयुक्त राष्ट्र और रेड क्रॉस में उठाया मामला :युद्धबंदी सैनिकों के परिवार लगातार रिहाई की मांग करते रहे हैं। वे संयुक्त राष्ट्र से लेकर रेड क्रॉस की अंतरराष्ट्रीय समिति तक इस मामले को ले जा चुके हैं। सिम्मी वराइच के अनुसार लगभग मिसिंग 54 के सभी सैनिक परिवार सरकार को लगातार चिट्‌ठी लिखते रहे हैं। हम भी लगातार चिटि्ठयां और ई-मेल लिखते रहे हैं। हम मीटिंग की कोशिश भी करते रहे हैं, लेकिन अब तक मीटिंग नहीं हो पाई है। कोई सेपरेट सेल नहीं है, जो इस मामले को देख सके। इस मामले पर किसी का ध्यान नहीं है।

जो भी नए लोग आते हैं, उन्हें पूरे मामले की जानकारी नहीं होती। 2007 में वाइस एयर चीफ ने परिवार के सदस्यों से कुछ मुलाकातें कीं। उन्होंने कहा कि जहां ये कंफर्म है कि प्लेन क्रैश हुआ है या किसी की जान गई है, वहां केस बंद करना चाहिए। लेकिन जहां सबूत हैं कि कोई सैनिक पकड़ा गया है और अब भी लापता है, वहां जांच होनी चाहिए। सुप्रीम कोर्ट में 2015 में चले केस को भी कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तान द्वारा युद्धबंदी बनाए गए सौरभ कालिया के केस के साथ क्लब कर दिया गया क्योंकि इस केस को भी इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में ले जाना था।

भारतीय सैनिक और युद्धबंदी

विश्वयुद्ध में बंदियोें को मारकर खाने वाले जापानी लेफ्टिनेंट को मिली मौत की सजा :पहले विश्वयुद्ध में करीब 20 लाख युद्धबंदी बने। पूरे युद्ध में कितने भारतीय युद्धबंदी थे, इसका स्पष्ट आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। लेकिन इसमें भाग लेने वाली करीब 93000 सैनिकों वाली सबसे बड़ी भारतीय सैनिकों की डिवीजन 13वीं (वेस्टर्न) डिवीजन के 13492 भारतीय या तो लापता हो गए या युद्धबंदी बनाए गए। दूसरे विश्वयुद्ध में करीब 67,340 भारतीय सैनिक पीओडब्ल्यू (प्रिजनर ऑफ वॉर) बने, जिसमें करीब 40 हजार जापान के कैम्पों में कैद हुए।

इन्हीं युद्धबंदियों में से करीब 30 हजार सैनिक बाद में रास बिहारी बोस और मोहन सिंह द्वारा बनाई गई इंडियन नेशनल आर्मी में शामिल हो गए। लेकिन बाकी बचे 10 हजार सैनिकों को यातनाएं झेलनी पड़ीं। 1946 की मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार एक जापानी लेफ्टिनेंट को 14 भारतीय युद्धबंदियों को मारकर खाने के आरोप में मौत की सजा सुनाई गई। ऐसी तस्वीरें भी सामने आईं, जिसमें जापानी सैनिक, भारतीय सैनिकों को टारगेट प्रैक्टिस के लिए इस्तेमाल करते नजर आ रहे थे।

भारत के युद्धों में1971 युद्ध के बाद 600 सैनिक सालभर तक कैद रहे पाक जेलों में :भारत-पाक और भारत-चीन युद्धों के कुल युद्धबंदियों की संख्या के स्पष्ट आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन अनुमान है कि इनमें करीब 4200 युद्धबंदी रहे हैं। भारत का पहला युद्ध 1947 में पाकिस्तान के साथ हुआ। इसमें किसी भी भारतीय सैनिक के युद्धबंदी होने की जानकारी नहीं है। 1962 में चीन के साथ युद्ध हुआ। 3942 भारतीय सैनिक युद्धबंदी बनाए गए। करीब 1696 लापता हो गए। 1965 के भारत-पाक युद्ध में एयर मार्शल के. नंदा करियप्पा 8 हफ्तों तक पाक के युद्धबंदी रहे थे।

1971 में एक बार फिर भारत-पाक युद्ध हुआ। इसमें पाक ने करीब 600 भारतीय सैनिकों को युद्धबंदी बनाया। वायु सेना के 16 पायलट्स भी पाकिस्तानी जेल में रहे। इसके बाद 1999 में हुए करगिल युद्ध में ग्रुप कैप्टन कंबापति नचिकेता और स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा को पाक सेना ने पकड़ा था। आठ दिन यातनाएं सहने के बाद नचिकेता रिहा हुए। वहीं अजय का मृत शरीर आया, जिसपर गोलियों के घाव थे। एलओसी से 5 और जवानों को भी पाक ने गिरफ्तार किया। इन्हें भी यातनाएं सहनी पड़ीं और जान गंवानी पड़ी।



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54 soldiers still in Pakistani jail, Captured 48 years despite evidence
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