पीओके हासिल करने के लिए भारत को बड़ी जंग लड़नी होगी, इसके लिए क्षमता बढ़ानी होगी: एक्सपर्ट्स

आदित्या लोक, स्पेशल करोस्पोंडेंट:

उदित बर्सले. कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटने के बाद से ही पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर (पीओके) चर्चा में है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने हाल ही में कहा था कि पाकिस्तान से अब सिर्फ पीओके पर बात होगी। वहीं, प्रधानमंत्री कार्यालय में मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि अब पीओके को आजाद कराने और भारत में शामिल कराने का वक्त आ गया है। ईश्वर से प्रार्थना करें कि हम अपने जीवनकाल में यह अवसर देख पाएं। दो दिन पहले ही राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने भी ट्वीट किया था कि 1947 में पं. जवाहरलाल नेहरू द्वारा यूएन में दायर किया प्रस्ताव वापस लेकर पीओके को सेना हासिल कर सकती है। कुल मिलाकर, पीओके हर किसी की जुबान पर है, लेकिन क्या वाकई इसे पाकिस्तान के कब्जे से छुड़ाया जा सकता है? यह जानने के लिए भास्कर ऐप प्लस ने पूर्व थल सेना प्रमुख जनरल दीपक कपूर और संविधान विशेषज्ञ विराग गुप्ता से बात की।


पीओके हासिल करने के लिए भारत को पहले से ज्यादा मजबूत होना होगा

  • पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल दीपक कपूर के मुताबिक, यदि एक प्रस्ताव वापस लेकर पीओके आसानी से हासिल किया जा सकता,तो पाकिस्तान से इतने युद्ध हुए हैं, हम अब तक यह कर चुके होते। यह भारत और पाकिस्तान के बीच का मामला है। इसमें यूएन का कोई लेना-देना नहीं है। शिमला समझौते के मुताबिक, दोनों देशों को इस मसले को हल करना होगा। किसी प्रस्ताव के वापस लेने भर से सेना मुजफ्फराबाद तक नहीं पहुंच जाएगी। पीओके हासिल करने का एक ही रास्ता है जंग और वो भी भयंकर जंग। इसके लिए हमें अपनी क्षमता को बढ़ाना पड़ेगा। मौजूदा ताकत से और ज्यादा मजबूत होना पड़ेगा। अभी भारत अपने इतिहास में सबसे मजबूत है। सरकार सक्षम है और वह कड़े फैसले कर सकती है। इसके पहले की सरकारें ऐसी नहीं थीं।
  • संविधान विशेष विराग गुप्ता बताते हैं कि भारत के हिस्से पर पाकिस्तान और चीन ने सैन्यबल से कब्जा किया था। उसे सिर्फ सैन्यबल से ही हम वापस हासिल कर सकते हैं। इसमें किसी तरह से कानूनी बाध्यता नहीं है। जहां तक 1947 में दायर प्रस्ताव को वापस लेकर पीओके हासिल करने की बात है, तो यह बिल्कुल भी प्रैक्टिकल नहीं है। यूएन से प्रस्ताव वापस लेना सिर्फ सांकेतिक है। इसका पीओके हासिल करने से कोई लेना देना नहीं है। पीओके भारत का अभिन्न अंग है, यह सही है। यह भी सही है कि पाकिस्तान ने भारत के हिस्से पर कब्जा किया हुआ है, लेकिन इसे वापस लाने का रास्ता यूएन से नहीं मिलेगा। यदि यूएन जाते भी हैं तो 1947 में दायर प्रस्ताव में पीओके वापस हासिल करने पर जनमत संग्रह की बात कही गई है। ऐसे में वह हमारे लिए सही नहीं है।


ऑफेंसिव-डिफेंस की नीति अपनानी होगी
जनरल दीपक कपूर के अनुसार, संभव सबकुछ है, लेकिन इससे पहले हमें आतंकवाद और पाकिस्तान के प्रति रवैया बदलना होगा। अभी तक हम डिफेंसिव मोड में रहे हैं, लेकिन अब हमें ऑफेंसिव-डिफेंस की नीति अपनाना होगी। यानी सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयर स्ट्राइक यह दिखाती है कि यदि हम पर हमला होगा तो हम न सिर्फ उसका माकूल जवाब देंगे बल्कि उसे जड़ से खत्म करेंगे। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का परमाणु हथियारों के इस्तेमाल पर आया बयान भी यह दिखाता है कि सरकार कितनी मतबूत है और दुश्मन को सही जवाब देने के लिए हम कितने सक्षम हैं।


आतंकियों को एलओसी पार करने से रोकना होगा
जनरल कपूर बताते हैं कि अभी हमें आतंकियों को नियंत्रण रेखा पार करने से रोकना होगा। चूंकि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटा है, इसलिए वहां के हालात सामान्य होने में समय लगेगा। पहला फोकस वहां के लोगों पर, खासकर घाटी के लोगों पर होना चाहिए। वहां के लोगों को जब यह अहसास हो जाएगा कि अनुच्छेद 370 हटना उनके लिए फायदेमंद है, भारत सरकार और सेना उनकी सुरक्षा और बेहतर भविष्य के लिए काम कर रही है, तो आगे की राह अपने आप आसान हो जाएगी।


पाकिस्तानी सेना को वहां से खदेड़ना होगा
संविधान विशेषज्ञ विराग गुप्ता के अनुसार, संविधान के मुताबिक, पीओके भारत का अभिन्न अंग है। यह पाकिस्तान का हिस्सा नहीं है। पीओके हासिल करने में न तो कोई कानूनी बाध्यता है और न संयुक्त राष्ट्र का कोई दबाव। यूएन इस मामले में कुछ नहीं कर सकता। अब बात आती है कि यह कैसे संभव है, तो बातचीत से इसका हल निकलने से रहा। दूसरा, जब जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के बाद पाकिस्तान तिलमिला गया तो पीओके की बात करने से क्या होगा, आप सोच ही सकते हैं। इसका एक ही रास्ता है, पाकिस्तानी सेना को वहां से खदेड़ना होगा।


क्या है शिमला समझौता
भारत-पाकिस्तान के बीच 3 जुलाई 1972 को शिमला समझौता हुआ था। इस पर भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जुल्फिकार अली भुट्टो ने दस्तखत किए थे। 1971 की जंग के बाद हुए इस समझौते में दोनों देशों ने तय किया था कि हर विवाद का समाधान शांतिपूर्ण तरीके से द्विपक्षीय बातचीत के जरिए हल किया जाएगा। साथ ही आपसी रिश्तों की ऐसी नींव तैयार की जाएगी, जिसमें दोनों तरफ के लोगों के बीच परस्पर संपर्क पर विशेष ध्यान दिया जाए। समझौते में भारत-पाकिस्तान के बीच नियंत्रण रेखा पर यथास्थिति बरकरार रखने पर भी सहमति बनी थी।


शिमला समझौते के अन्य बिंदु

  • भारत-पाकिस्तान आपसी संघर्ष और टकराव खत्म कर आपसी रिश्तों को आगे बढ़ाने तथा उपमहाद्वीप में शांति की स्थापना के लिए मैत्रीपूर्ण और सौहार्दपूर्ण रिश्तों को बढ़ावा देंगे
  • दोनों देश अपने संसाधनों और ऊर्जा का इस्तेमाल अपने लोगों की स्थिति में सुधार करने के लिए समर्पित करेंगे।
  • सरकारें एक-दूसरे के खिलाफ किए दुष्प्रचार को रोकने के लिए हरसंभव कदम उठाएंगी।
  • दोनों देश ऐसी सूचनाओं के प्रसार को प्रोत्साहित करेंगे, जिनसे दोस्ताना रिश्तों के विकास को बढ़ावा मिले।
  • भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा पर सेना में कटौती करेंगे।
  • 17 दिसंबर 1971 के संघर्ष विराम से बनी नियंत्रण रेखा का सम्मान दोनों पक्षों द्वारा बिना किसी पूर्वाग्रह के किया जाएगा। आपसी मतभेदों और कानूनी व्याख्याओं के बावजूद कोई पक्ष इसे एकतरफा बदलने की कोशिश नहीं करेगा। इस रेखा के उल्लंघन के लिए बल प्रयोग या फिर उसकी धमकी देने से दोनों पक्ष खुद को दूर रखेंगे।


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