21वीं सदी में करीब 25% सांसद राजवंशी; इनमें 16% भाजपा, 38% कांग्रेस के
आदित्या लोक, स्पेशल करोस्पोंडेंट:
नई दिल्ली. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वंशवाद पर किए एक ट्वीट के बाद इस मुद्दे पर जोरदार बहस खड़ी हो गई। भास्कर ने इसकी गहन पड़ताल की तो यह बात एकदम साफ उभरकर सामने आई कि देश की राजनीति में राजवंशी (कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के एक शोध में उन नेताओं को 'राजवंशी' नेता कहा गहा है, जिनके परिवार से कोई न कोई सदस्य चुनावी राजनीति मेें सक्रिय रहा हो) ही प्रभावी हैं। अगर हम 21वीं सदी में हुए तीन लोकसभा चुनावों (2004, 2009 और 2014) की बात करें, तो ये तथ्य उभरकर सामने आता है कि इस सदी मेें एक चौथाई सांसद ऐसे जीते हैं, जिनका ताल्लुक किसी न किसी राजनीतिक परिवार से रहा है। यानी 21वीं सदी में करीब 25% सांसदों की पारिवारिक पृष्ठभूमि राजनीति से जुड़ी रही है।
पिछले तीन चुनावों को देखें, तो 1611 सांसदों में 390 राजवंशी चुने गए। इतना ही नहीं, सभी पार्टियों ने सीट बढ़ाने के लिए इन राजवंशियों (डायनेस्टी) को जमकर टिकट दिए। चौंकाने वाली बात है यह है कि 21वीं सदी में एक भी राजवंशी सांसद निर्दलीय के तौर पर नहीं जीत पाया। चौंकाने वाली बात यह है कि आजादी के पहले जो राॅयल परिवार यानी राजा-महाराजा, जागीरदार और जमींदार तबके से जाने जाते थे, उनमें से सिर्फ 3% सांसद इनसे संबंध रखते हैं। कुल राजवंशी सांसदों में इनकी संख्या सिर्फ 10% ही है।
इस मामले में विशेषज्ञों की राय अलग-अलग है। चुनावी विश्लेषण करने वाली संस्था सीएसडीएस के निदेशक संजय सिंह कहते हैं कि कोई सांसद भले ही राजनीतिक राजवंशी परिवार से हो, लेकिन उसे चुनती तो जनता ही है। सिर्फ राजवंशी होने के कारण कोई भी सांसद बार-बार चुनाव नहीं जीत सकता। उसे हर हाल में काम करना ही पड़ेगा। एडीआर के जगदीप छोकर कहते हैं कि राजवंशियों को टिकट नहीं दिया जाना चाहिए, क्योंकि वे रसूख का इस्तेमाल करते हैं।
न्यूयाॅर्क यूनिवर्सिटी में राजनीति विभाग की प्रो. कंचन चंद्रा ने 21वीं सदी में हुए चुनावों पर शोध किया और पता लगाने की कोशिश की कि राजनैतिक पृष्ठभूमि से आने वाले कितने सांसद लोकसभा में बैठ रहे हैं। उन्होंने डेमोक्रेटिक डायनेस्टीज (स्टेट, पार्टी एंड फैमिली इन कंटेम्पेरेरी इंडियन पॉलिटिक्स) किताब लिखी है। इसमें राजवंशी सांसद उसे माना है जिनके परिवार से कोई न कोई सदस्य चुनावी राजनीति में सक्रिय रहा हो। भले ही उनमें रक्त संबंध, बहू, मां, चाचा, दादा और दामाद जैसे रिश्ते क्यों न हों। किताब का कॉपीराइट कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस के पास है। चंद्रा के मुताबिक, परिवारवाद राजनीति की हकीकत बन चुका है, जो लोकतंत्र को हिंसक बना रही है। इसमें पंचायत से लेकर सीएम, पीएम की कुर्सी तक मौजूद है।
पिछले तीन चुनावों में391 सांसद राजवंशी
| साल | राजवंशी सांसद |
| कुल | प्रतिशत | |
| 2004 | 109 | 20 |
| 2009 | 163 | 30 |
| 2014 | 119 | 22 |
राजवंशियों को टिकटदेने में कांग्रेस आगे
| साल | भाजपा | कांग्रेस |
| 2004 | 14% | 28% |
| 2009 | 19% | 40% |
| 2014 | 15% | 48% |
राजवंशी सांसद उत्तर में घटे, दक्षिण में बढ़े
| क्षेत्र | 2009 | 2014 |
| पूर्व | -- | 24% |
| पश्चिम | 18% | 18% |
| उत्तर | 41% | 22% |
| दक्षिण | 24% | 29% |
(पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के परिवार से कोई भी राजनीति में नहीं है)
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