सचिन की पसंद की 11 चुनिंदा कहानियां: खेलने के लिए 'मोबाइल छोड़, मैदान पकड़ अभियान'

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सचिन तेंदुलकर चाहते हैं कि भारत खेलप्रेमी देश से खेलने वाला देश बने। उनके इस अभियान में साथ आते हुए दैनिक भास्कर ने विशेष कॉन्टेस्ट चलाया। तीन दिन तक चले इस कॉन्टेस्ट में पाठकों से हमें कुल 3180 एंट्रीज मिली। इन एंट्रीज में पाठकों ने खेल से जुड़े अपने अनूठे अनुभव और लीक से हटकर किए गए काम साझा किए। सचिन ने इन एंट्रीज को पढ़ा और उनमें से 11 कहानियां चुनीं...

वे 11 लोग, जो विजेता बने

  • मालती जायसवाल, बिलासपुर
  • धनराज सिंह, उज्जैन
  • मंजू शर्मा, भरतपुर
  • निशित आचार्य, अहमदाबाद
  • मो. अली हिरानी, दुर्ग
  • सुमन चौधरी, जोधपुर
  • तरुण कुमार, रांची
  • हरी महाले, नासिक
  • आशा खण्डेलवाल, जयपुर
  • रमेश कहर, मुंबई
  • सुयश शर्मा
  1. ये कहानी 11 साल के बच्चे की है, जो 4 साल से ही क्रिकेट प्रेमी है। तब वह कपड़े धोने की पिटनी से खेलता था। फिर, उसे प्लास्टिक का बैट और गेंद मिली। इससे वह दीवार पर गेंद मारकर अकेले ही खेलने लगा। विहान पढ़ाई में भी अव्वल था। कुछ साल बाद वो अपने से छोटे बच्चों को फ्री में पढ़ाने लगा,ताकि पढ़ाने के बाद वो उनके साथ खेल सके। बच्चे रोज एक-एक घंटा पढ़ते और खेलते थे। इससे वो फिट भी रहने लगे। उनके परिजन भी खुश थे। हर कंडीशन में वे रोज 4 घंटे खेलते ही थे। बच्चों की इस दीवानगी की मैं गवाह हूं। मैं विहान की बुआ हूं। मेरी दुआ है कि देश का हर बच्चा ऐसा ही बने। इससे भारत खेल प्रेमी देश से खेलने वाला देश बन सकेगा। - मंजू शर्मा, भरतपुर

  2. खेल शारीरिक और मानसिक विकास को प्रभावित करता है, इसका उदाहरण है मेरा बेटा ईशान। वो जन्म से ही मानसिक रूप से कमजोर है। मोहल्ले के बच्चे उसके साथ नहीं खेलतेे थे। पागल कहतेे थे। स्कूल में भी कई मुश्किलें आती थीं। इन सबसे मैं काफी दुखी थी। हिम्मत हारने लगी। फिर कहीं से पैरा गेम्स के बारे में पता चला। बेटे को लेकर मैं जयपुर के सवाई माधोपुर स्टेडियम पहुंची। एथेलिटिक्स की ट्रेनिंग शुरू करवाई। यहीं से बेटे की जिंदगी बदल गई।

    खेलने से उसके मानसिक विकास में परिवर्तन आया। शरीरिक मजबूती मिली। मेहनत रंग लाई। उसने एक साल के अंदर ही स्टेट, नेशनल और इंटरनेशनल लेवल पर 8 गोल्ड और एक ब्रॉन्ज मेडल जीता। अखबार की सुर्खियां बना। नई पहचान मिली। आज वो सामान्य बच्चों की तरह जीवन जी रहा है। यह सुखद अनुभव उसे खेल ने दिया। उम्मीद है एक दिन ईशान वर्ल्ड चैंम्पियनशिप में भारत का प्रतिनिधित्व कर देश की शान बनेगा।- आशा खण्डेलवाल, जयपुर

  3. मैं जिला पंचायत स्कूल में टीचर हूं। हम बच्चों को अलग-अलग खेल अपनाने के लिए प्रेरित करते हैं। हमने लड़कियों के लिए खो-खो शुरू किया। शुरु में हॉफ पैंट में खेलने की वजह से लड़कियों ने मना किया। बाद में हमारी ट्रिप मुंबई गई।जहांगीर आर्ट गैलरी में हॉफ पैंट, टी-शर्ट में विदेशी पर्यटक दिखे। उन्हें देख लड़कियों का मन बदला।

    अहसास हुआ कि यह खेल के कपड़े हैं। इनसे संस्कृति की हानि नहीं है। वो खो-खो खेलने को तैयार हुईं। फिर शिक्षकों ने पैसे जुटाकर लड़कियों की खो-खो ड्रेस खरीदी। 14 से कम उम्र की लड़कियों ने लड़कों को हराया। आज इस टीम की 9 लड़कियां स्टेट लेवल और एक नेशनल लेवल की खिलाड़ी है। - हरी महाले, नासिक

  4. मैं स्टेट लेवल फुटबॉलर हूं। 12वीं में पढ़ता हूं। फुटबॉल सीखने के शुरुआती दौर में मुझे काफी मुश्किलें आईं। इनमें से एक है अपने एरिया में बेहतर कोच का पता लगाना और उनसे गाइडेंस लेना। मैंने महसूस किया कि लोग इसी प्रॉब्लम के चलते आगे नहीं बढ़ पाते होंगे। उन्हें सही गाइडेंस नहीं मिलता होगा। मैंने और मेरे दोस्तों ने इस समस्या को दूर करने के लिए वेबसाइट www.playerconnect.in बनाई है। अभी इसमें जानकारी जोड़ रहे हैं।

    इसमें क्रिकेट, फुटबॉल, वॉलीबॉल, टेनिस और बास्केट बॉल आदि कई खेलों को लेकर लोकल लेवल पर जानकारी मिलेगी। आपके एरिया के खेल मैदानों और बेस्ट कोच के बारे में पता चलेगा। उस एरिया के स्कूल और अन्य संस्थाओं द्वारा कराए जाने वाले टूर्नामेंट की जानकारी भी मिलेगी। हमारा मकसद ऐसे बच्चों और युवाओं की मदद करना है जो खेल के जरिए पहचान बनाना चाहते हैं। लेकिन सुविधाओं और जानकारी के अभाव के चलते ऐसा नहीं कर पा रहे हैं। - सुयश शर्मा

  5. कम उम्र से ही मोबाइल की आदत बच्चों को एकांत की ओर ढकेल रही है। मम्मी-पापा भी बच्चों को मोबाइल देकर खुश करने में लगे हैं। नतीजतन आउटडोर गेम्स से बच्चे दूर होते जा रहे हैं। मेरे मोहल्ले में भी यही स्थिति थी। मोहल्ले का प्ले ग्राउंड खाली रहता था। वहां गाड़ियां पार्क होने लगी थीं। इन सबसे परेशान होकर मैंने 'मोबाइल छोड़-मैदान पकड़' अभियान शुरू किया है,ताकि बच्चे मोबाइल की जगह ग्राउंड में समय बिताएं।

    हम दो साल से यह अभियान चला रहे हैं। पहले हमने खेल मैदान से पार्किंग हटवाने का फैसला किया। शासन ने नहीं सुनी तो बच्चों की मदद से खुद ही इस काम को अंजाम दिया। साथ ही बच्चों और उनके परिवार को आउटडोर गेम्स के लिए प्रेरित किया। मोबाइल में लगे रहने के नुकसान और बाहर खेलने से होने वाले फायदे के बारे में बताया। सब सहमत हुए और अब खाली मैदान भरने लगा है। बच्चे यहां खेलने आते हैं।- रमेश कहर, मुंबई

  6. गुजरात केदसक्रोई तहसील में गांव है रोपड़ा। यहां पंचायत ने ही फैसला किया है कि बच्चों को खेलों से जोड़ा जाएगा। जब परिजनों ने साथ दिया तो गांव के स्कूल के 140 बच्चे अब स्केटिंग करते हैं। 80 से ज्यादा कराटे की ट्रेनिंग ले रहे हैं। राज्य स्तर पर आयोजित हुए प्रतियोगिता में गांव के स्कूल को 10 गोल्ड, 7 सिल्वर और 5 ब्रान्ज अवॉर्ड मिले है। इसी स्कूल के बच्चे 3 बार जिला स्तर पर खो-खो प्रतियोगिता जीत चुके हैंं। बच्चों का साल में 3 बार सरकारी आरोग्य केंद्र और सेवा अभियान द्वारा फिटनेस टेस्ट होता है। इस गांव की हर बच्ची पढ़ाई के साथ खेलों में आगे आ रही है।- निशित आचार्य, अहमदाबाद

  7. अपने इलाके के लोगों को खेल और शिक्षा के प्रति जागरूक करने के लिए मैंने और मेरे आर्मी पर्सन भाई ने एक टीम बनाई है। एक साल पहले बनी इस नजरपुर स्ट्राइकर्स टीम में आज 55 सदस्य हैं। हम शारीरिक फिटनेस के लिए रोज पहले रनिंग करते हैं। फिर सभी सदस्य फुटबॉल, वॉलीबॉल या कबड्डी में से कोई एक गेम खेलते हैं। इसको लेकर प्रतियोगिता भी कराते हैं। जिला स्तरीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा भी लेते हैं।

    हमारी टीम आसपास के लोगों को भी प्रशिक्षित करती है। पिछले साल हमारी टीम के 3 सदस्यों का चयन आर्मी में हुआ है। इतना ही नहीं, हमारी टीम के एक सदस्य का चयन आईन बॉल इंटरनेशनल कैम्प के लिए भी हुआ है। यह सब हमने बिना किसी प्रोफेशनल ट्रेनिंग या वित्तीय मदद के हासिल किया है। हमारे जो सदस्य आर्मी में सेलेक्ट हुए थे, अब वो हमे कुछ वित्तीय मदद देते हैं। ताकि खेल के प्रति जागरुकता फैलाने का यह अभियान जारी रहे।- धनराज सिंह, उज्जैन

  8. बच्चों को खेलने की आजादी देने से मानसिक और शारीरिक दोनों तौर पर फायदा होता है। मेरा बेटा आज डॉक्टर है। उसे बचपन से खेलने की आजादी देने के चलते मैंने ऐसा महसूस किया है। बोर्ड एग्जाम के समय में भी मैं उसे खेलने भेजती थी। मैं एक बार की कहानी शेयर करना चाहती हूं। हम जबलपुर के अंजनी विहार कॉलोनी में रहते थे। वहां घर के पास ही एक श्रीवास्तव परिवार रहता था। उनकी बच्चियां भी मेरे बेटे के साथ पढ़ती थीं।

    बोर्ड एग्जाम के टाइम पर मेरा बेटा पढ़ाई के साथ-साथ कुछ देर खेलने भी जाया करता था। जबकि श्रीवास्तव अंकल की बेटियां सिर्फ पढ़ती रहती थीं। इतना ही नहीं, जब मेरा बेटा खेलने जाता था तो वो उसे डांटते भी थे। इन सबके बीच मेरा बेटा उस साल के रिजल्ट में फर्स्ट आया। इस अनुभव को शेयर करने के पीछे मेरा मकसद यह है कि खेलने के बाद बच्चे ज्यादा फ्रेश महसूस करते हैं। ज्यादा मन लगाकर पढ़ते हैं। इसलिए माता-पिता को खेलने की पूरी आजादी देनी चाहिए। -मालती जायसवाल, बिलासपुर

  9. बात 1982 की है, जब मैंने कल्याण कॉलेज में एडमिशन लिया। मैं अपने स्कूल में क्रिकेट का कप्तान भी रह चुका था और इंटर स्कूल विजेता भी रह चुका था। कॉलेज में क्रिकेट की कोई टीम नहीं थी। पता चला कि कॉलेज प्रबंधन के पास बजट की कमी है। लेकिन प्रिंसिपल ने कहा, आप टीम बनाइए। रुपयों की व्यवस्था हो जाएगी।

    1983 में इंटर यूनिवर्सिटी मैच हुए। हमें जीत के लिए 12 गेंदों पर एक रन बनाना था। हमारे पास दो विकेट शेष थे। लेकिन इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्रों बैट्समैन को डरा-धमका कर रन नहीं बनने दिया। उस वक्त मैंने एक बात नोटिस की। जो छात्र दुर्ग और भिलाई में क्रिकेट खेल रहे थे वे रायपुर के छत्तीसगढ़ कॉलेज और दुर्गा कॉलेज में एडमिशन लेकर पढ़ रहे थे। इसके बाद मैंने उनकी लिस्ट बनाई, जिन्हें मैं जानता था। सभी से मिलकर जानकारी ली कि वे रायपुर में एडमिशन क्यों ले रहे हैं। मुझे दो बातें पता चलीं। पहली- यूनिवर्सिटी लेवल पर क्रिकेट खेलना है तो रायपुर ही विकल्प है। दूसरी- कल्याण कॉलेज में 60% से नीचे वाले छात्रों को एडमिशन नहीं दिया जाता है।

    और क्रिकेट खेलने वालों का स्कोर 60% से कम ही था। इसके बाद मैं प्रिंसिपल सर से मिला। मैंने उनको बताया कि भिलाई के छात्र रायपुर में एडमिशन क्यों ले रहे हैं। उन्होंने मुझसे पूछा- ये सब मुझे क्यों बता रहे हो। मैंने उनको बताया कि यदि यहां भिलाई और दुर्ग के छात्रों को एडमिशन मिलेगा, तो कल्याण कॉलेज विजेता टीम बन सकती है। मेरा जवाब सुनकर प्रिंसिपल खुश हो गए। बोले- छात्रों को ले आओ, उन्हें मैं एडमिशन दूंगा। इसके बाद खुद दो मैदान तैयार करवाया। 1984 में इंटर यूनिवर्सिटी मैच भिलाई में हुए। और पहली बार कल्याण कॉलेज इंटर यूनिवर्सिटी विजेता बना। हमारे इस प्रयास में कॉलेज के प्रमोद शंकर शर्मा सर का अहम योगदान रहा। वह आज छत्तीसगढ़ क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के अध्यक्ष हैं। इस प्रयास को मैं भिलाई क्रिकेट के लिए अपना बड़ा अचीवमेंट मानता हूं। क्योंकि राजेश चौहान भी कल्याण कॉलेज की उपज हैं, जो भारतीय क्रिकेट टीम के लिए चुने गए थे। -मोहम्मद अली हिरानी, दुर्ग

  10. मैं जोधपुर के तिंवरी क्षेत्र की गगाड़ी ग्राम पंचायत की सरपंच हूं। मेरी पंचायत में आने वाले गांवों की महिलाओं की जिंदगी घूंघट में गुजरने को मजबूर थी। उनका शारीरिक और मानसिक दोनों विकास मुश्किल हो रहा था। बच्चों में कुपोषण बढ़ रहा था। उनके लिए गांव में कोई विशेष आयोजन होना और उसे देखने जाना किसी बड़े सपने जैसा ही थी। महिला सरपंच होने के नाते मैंने महिलाओं के इस दर्द को महसूस किया। उनसे बात की। पता चला अधिकांश महिलाएं मानसिक तनाव का शिकार हैं। दिनभर घर की चारदीवारी में कैद रहना इसका कारण था।

    इसी बात को समझकर मैंने महिला सशक्तिकरण के लिए एक खेल आयोजन शुरू किया। ताकि महिलाएं मानसिक और शारीरिक तौर पर फिट और एक्टिव रह सकें। पुरुषों से बातचीत और मुश्किल से उन्हें मनाने के बाद इस आयोजन में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इसमें लगभग सभी उम्र की महिलाएं शामिल थीं। इस टूर्नामेंट में हमने विभिन्न प्रकार के खेलों का आयोजन किया। इनमें भी कबड्डी और रस्साकसी में सबसे ज्यादा लोगों ने भाग लिया। विजेताओं को पुरस्कार भी दिया। मेरे इस आयोजन से लोगों की सोच में बदलाव आया है। अब वह पुरुषो के साथ-साथ काम करने के साथ सर्वजनिक रूप से घूँघट के बाहर भी रहती हैं।

    खेल को अपनी जिंदगी का हिस्सा बना लिया है। ताकि फिट और खुश रहें। अब महिलाएं खुद टूर्नामेंट करवाती हैं। अब तक 3 बार ऐसा हो चुका है। इतना ही नहीं, इन खेलों को महिलाओं के लिए घर पर भी प्रैक्टिस जारी है। हम सबके इस प्रयास से महिलाओं को एक नई जिंदगी सी मिली है। इसी कार्यक्रम के माध्यम से गांव और यहां की महिलाओं की बाकी समस्याओं के बारे में भी पता चला। जिसे दूर किया जा रहा है। इस तरह हमारे गांव की महिलाओं की जिंदगी में बदलाव का बड़ा कारण खेल बनकर सामने आया है। -सुमन चौधरी, जोधपुर

  11. खेलों में पुरुषों के साथ महिलाओं की भागीदारी बेहद अहम है। इसी के तहत झारखंड में हमारे माटी फाउंडेशन ने समानता का संदेश देने के लिए अनोखी पहल शुरू की है। फाउंडेशन ने 22 नवंबर 2018 में रांची के पांडाडीह गांव में 'माटी विलेज प्रीमियर लीग' का आयोजन कराया। लीग में चार स्कूलों की टीमों के बीच 5 क्रिकेट मैच खिलाए गए। यह मैच खास थे। क्योंकि यहां खेलने वाली हर टीम में चार-पांच लड़कियां भी थीं।

    इन्होंने न सिर्फ अच्छी बैटिंग की, बल्कि गेंदबाजी से लेकर फील्डिंग तक में बेहतर प्रदर्शन किया। जीत के इरादे से मैदान पर उतरीं मिश्रित टीमों ने मिलजुल कर बेहतर खेल की भावना भी प्रदर्शित की। खिलाड़ियों का उत्साह बढ़ाने के लिए कॉमेंट्री भी की गई। यह क्रिकेट लीग संभवत: देश में अपनी तरह की अनोखी लीग थी, जिसमें एक ही टीम में लड़के और लड़कियां दोनों थीं। इस अनोखे मैच को देखने के लिए आसपास के ग्रामीणों के अलावा दूर-दराज क्षेत्रों के लोग भी पहुंचे थे। - तरुण कुमार रांची



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      सचिन तेंडुलकर।

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