खेल के जरिए सामाजिक समरसता और बदलाव लाने वाली तीन कहानियां जो सचिन ने चुनीं
सचिन तेंडुलकर आज भास्कर के गेस्ट एडिटर हैं। वे चाहते हैं कि भारत खेलप्रेमी देश से खेलने वाला देश बने। उनके इस अभियान में हिस्सा लेते हुए भास्कर के पाठकों ने खेल से जुड़े लीक से हटकर किए काम और अनूठे अनुभव साझा किए। सचिन ने सामाजिक समरसता और बदलाव लाने वाली तीन सबसे पावरफुल कहानियां चुनीं। सचिन कहते हैं समाज में भेदभाव मिटाने के लिए खेल सबसे बड़ा जरिया है। क्योंकि हम जब खेलते थे, एक दूसरे को धर्म-जाति से नहीं जानते थे। उनका सुझाव है कि राइट टू एजुकेशन की तरह ही राइट टू प्ले कानून लाना चाहिए। माता-पिता खेलने की आजादी दें, यह कानूनी तौर पर इंश्योर हो।
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मुकेश महतो,उदयपुर .उदयपुर से 40 किलोमीटर दूर है आदिवासी गांव जावर-पालड़ा। इस गांव को फुटबॉल विलेज कहा जाता है। वजह यह कि यहां फुटबॉल पुश्तैनी खेल है। घर-घर में फुटबॉलर हैं। यही वजह है कि 410 परिवार वाले गांव से अब तक 80 से अधिक नेशनल फुटबॉलर निकल चुके हैंं। गांव के बाबू मनी, सुब्रतो भट्टाचार्य, मगन सिंह राजवी बतौर कप्तान देश का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। कई परिवारों की तीन से चार पीढ़ियां फुटबॉल खेल रही हैं। फुटबॉल से लोगों के घर चल रहे हैं। यहां की जिंक माइंस में फुटबॉल के कई खिलाड़ियों को नौकरी दी गई है।
सरकारी स्कूल में पीटीआई फिरोज बताते हैं कि वह जो कुछ भी हैं, इसी टूर्नामेंट की बदौलत हैं। उनके पिता भी फुटबॉलर रहे हैं। अब बेटा-बेटी को भी ट्रेनिंग दिला रहे हैं। यहां महिलाओं और बच्चों में भी फुटबॉल को लेकर ऐसी जागरूकता है कि हर नियम या रेफरी के निर्णय को भली-भांति समझते हैं। बुधवार को यहां टूर्नामेंट का फाइनल हुआ। टूर्नामेंट का आयोजन जिंक माइंस के मजदूर अपने वेतन से करते हैं। देशभर से आने वाले खिलाड़ियों के रहने से लेकर खाने-पीने की व्यवस्था भी वही करते हैं।
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एम. पूर्णिमा, हैदराबाद .हैदराबाद के बालापुर इलाके की तंग गलियों में म्यामांर से भागकर आए रोहिंग्याओं की छोटी सी बस्ती है। यहां 450 से 500 रोहिंग्या परिवार रहते हैं, जो मजदूरी कर जी रहे हैं। फुटबॉल ने युवाओं को जीने की वजह दी है।
23 साल के शेख अब्दुल्ला की दुकान के सामने आपको हमेशा कुछ बच्चे फुटबॉल खेलते दिखेंगे। ये अब्दुल्ला का रिफ्यूजी फुटबॉल क्लब है। अब्दुल्ला कप्तान हैं और उनके क्लब ने जूनियर और सीनियर ग्रुप में देश में कई मैच खेले हैं। जीते भी हैं। पूरा दिन मजदूरी करने के बाद रोज शाम सात बजे से रात 10 बजे तक अब्दुल्ला और उनके साथी मैदान में पसीना बहाते हैं। अब्दुल्ला का परिवार 2014 में म्यांमार से आया। क्लब के सदस्य सलीम बताते हैं- पहले हमें संदेह से देखा जाता था। अब फुटबॉल की वजह से हमें इज्जत और आत्मसम्मान मिला।
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कौशल स्वर्णबेर,चिंतागुफा .नक्सल प्रभावित जिला सुकमा। यहां चिंतागुफा में नक्सलियों के साथ संघर्ष में 150 जवान शहीद हो चुके हैं। रोज संघर्ष की खबरें आती हैं। दूसरी ओर सीआरपीएफ के जवान खेल के जरिए बच्चाें को नक्सल मुक्त बनाने की कोशिश में जुटे हैं।
बच्चों को रस्साकसी के अलावा क्रिकेट, फुटबॉल और दौड़ की ट्रेनिंग दी जा रही है। डिप्टी कमांडेंट रमेश यादव ने बताया कि शुरू में बच्चे पास आने से कतराते थे। अब रोज शाम को कैम्प में आकर खेलते हैं। खेल के साथ बटालियन के जवान बच्चों को पढ़ाते भी हैं। देशभक्ति से जुड़ी फिल्में दिखाते हैं। यादव कहते हैं कि यह इलाका नक्सलियों के सबसे बड़े कैडर वाले नेताओं का है। लोगों पर उनका जबरदस्त दबाव रहता है। लेकिन, बच्चों पर उनका वश नहीं चल पाता। पढ़ाई के बाद बच्चे अब सीधे कैम्प आ जाते हैं।
- राइट टू एजुकेशन की तरह ही राइट टू प्ले कानून लाना चाहिए। माता-पिता खेलने की आजादी दें, यह कानूनी तौर पर इंश्योर हो।
- स्कूल में रोज दो पीरियड स्पोर्ट्स के हों। स्कूल को मान्यता देने या रिन्यू करने के दौरान 50% वेटेज स्पोर्ट्स एक्टिविटीज को दी जाए।
- ग्रामीण इलाकों में बच्चों को इनडोर-आउटडोर गेम्स की सुविधाएं मिले। इंश्योर किया जाए कि गांवों में मैदान और ट्रेनर की सही व्यवस्था हो।
- स्टार खिलाड़ियों के लिए सीएसआर की तर्ज पर अनिवार्य होना चाहिए कि वे साल के 7 से 10 दिन स्कूलों या एकेडमी में ट्रेनिंग दें।
- खिलाड़ी का करिअर 30-35 की उम्र तक होता है। इसलिए जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों को खेल के बाद ट्रेनर बनाया जाए।
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