अपने अंदर के बच्चे को खिलखिलाने दो, फिर आएगा असली स्वाद जिंदगी में: पीयूष पांडे
मुंबई. बात चाहे 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' की हो या फिर लूना, फेविकोल, कैडबरी या गूगल के न भुलाए जा सकने वाले विज्ञापनों की, एक नाम हमेशा याद आता है, पद्मश्री पीयूष पांडे। 1982 से चली आ रही उनकी क्रिएटिविटी की यात्रा 64 की उम्र में भी अथक जारी है। ऊर्जा और सकारात्मकता से भरे पीयूष ने पिछले दिनों दुनिया की मशहूर एडवरटाइजिंग कंपनी ओ एंड एम के वर्ल्ड चीफ क्रिएटिव ऑफिसर का पद संभाला है। पीयूष का पूरा क्रिएटिव कॅरिअर इसी कम्पनी के साथ आगे बढ़ते हुए आज एक वैश्विकमुकाम पर पहुंचा है।
मुंबई में दैनिक भास्कर के साथ एक विशेष बातचीत में पीयूष पांडे ने कई मजेदार, प्रेरक और दिलचस्प बातें बताईं और जिंदगी में कुछ अच्छा सोचने औरकर गुजरने की सोच साझा की। प्रस्तुत है उनसे लंबी बातचीत:
पीयूष:बतौररणजी क्रिकेटर मैं पूरे देश में घूमा करता था, और इसी खेल से मैंने एक बड़ा सबकसीखा कि खेल हो या जिंदगी एक अकेला इंसान नहीं जीतता है। जीतती है तो एक अच्छी टीम। मैंने अपने हर काम में, हर मोर्चे पर इसी सबक को ध्यान में रखा और टीम भावना को ऊंचा रखा। मेरा बनाया हर विज्ञापन एक टीम की देन है, मैं तो बस उसका एक हिस्सा हूं। अगर मेरा क्रिएटिव काम लोगों का दिल जीतता है तो यह उसके पीछे की पूरी टीम की जीत है। मैं तो कहूंगा कि जिस भी क्लाइंट के लिए हम काम करते हैं, वह भी हमारी टीम का सदस्य है और सबसे महत्वपूर्ण है कि वह लोगों को पसंद आए, वही काम पूरे मजे से, पूरे मन से करें तो कमाल के नतीजे मिलते हैं।
पीयूष: कोई आइडिया अपने आप नहीं आता, इसके लिए बस, दिमाग को खुला छोड़ दो। मैं जब भी कुछ नया सोचता हूं या करना शुरू करता हूं तो इसका कोई खास माइंडसेट या अवस्था नहीं होती। मतलब यह कि, मन से सोचो, सोचो कि सामने वाले को मजा कैसे आएगा! हां, उसके लिए तैयारी पूरी करनी चाहिए। सब्जेक्ट की जानकारी पूरी होनी चाहिए। एक विज्ञापन की ही बात करें तो मैं हमेशा चार बातें ध्यान में रखता हूं कि मुझे क्या कहना है, किससे कहना है, कौन इसे देखेगा या सुनेगा और फिर आखिर में यह कैसा लगेगा?; कहीं ऐसा न हो कि लोगों को वह कोरा ज्ञान लगे। दरअसल, आजकल ज्ञान कोई लेना नहीं चाहता। असली मजा लॉजिकली सोचने में नहीं, इमोशनली कनेक्ट होने से आता है। लॉजिकल थिंकिंग भी जरूरी है, पर जब आप भावनाओं को बहने देते हैं तो सबके साथ जुड़ना आसान हो जाता है। अपनी बात या मैसेज पहुंचाना सरल हो जाता है। इसे आप एक डाइविंग लगाने के स्प्रिंग बोर्ड से समझ सकते हैं कि आपको उस बोर्ड को जानना जरूरी है, लेकिन जब आप उसके साथ लीप (छलांग) लगाते हैं तो सब कुछ भूल जाना होता है, बस ये ध्यान में रखना है कि मंजिल तक कैसे पहुंचूंगा। बात चाहे कोई प्रॉडक्ट बेचने की हो या फिर लोगों को पोलियो की दो बूंद पिलाने के लिए प्रोत्साहित करने की, तो उसके पीछे की भूमिका को जानना जरूरी है।
पीयूष: 1986-87 के दौर में जब मैंने 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' गीत लिखा तो इसके पीछे स्व. सुरेश मलिक की सोच थी। ये उन्हीं का आइडिया था। उन्होंने इसे लिखने के लिए कई बड़े गीतकारों से बात की थी, पर वे चाहते थे कि ये बहुत सुमधुर और सरल बने। एक दिन उन्होंने मुझे बुलाया और कहा कि, 'पीयूष तुम इस गीत को लिखो लेकिन ध्यान रहे कि इसमें हमें बहुत ज्यादा ठूंसना नहीं है। हमें इसमें बार-बार देशभक्ति जगाने वाले शब्दों की की बजाय ऐसे शब्द लाने हैं जिससे लोग देश को, इसके संगीत को, लोगों को, इसकी सुंदरता और विविधता को महसूस कर सके।' और, वाकई हम उसी सोच के साथ आगे बढ़े तो ये रचना बनी और फिर जब पंडित भीमसेन जोशी ने संगीत की रचना की और बाकी कलाकार साथ आए तो एक सोच के साथ देश की तमाम बड़ी भाषाओं में इसे रचकर एक सुर में गूंथा गया। बाद में लोगों ने सम्मान देते हुए कहा कि ये देश में एक दूसरे राष्ट्रगीत की तरह बना है। मैं कहूंगा कि ये ऊपरवाले की मेहरबानी थी। ऐसा कभी कभार ही होता है कि इतने अच्छे लोग एक साथ आए और ईश्वर हमसे ये बड़ी सरलता से करवाना चाहता था, तो ऐसा ही हुआ।
पीयूष: बदलाव जिंदगी में आते रहते हैं, बस आपको उनको रिवाइंड करना आना चाहिए। अपने अंदर के मासूम बच्चे को जगाना आना चाहिए। मैं जयपुर में पला-बढ़ा, सेंट स्टीफंस में पढ़ा, खूब क्रिकेट खेला, देशभर में घूमता रहा और फिर जब कम्यूनिकेशन की इंडस्ट्री में आया तो सब भूलकर आया कि मैं कौन से कॉलेज में गया था और क्या पढ़ा था। इसीलिए मैं भूलकर रिवाइंड करने की बात कर रहा हूं क्योंकि तभी आपको याद आता है कि मैंने इस देश को, इसके लोगों को, इसकी संस्कृति को, इसकी विविधता को कैसे जाना। अगर आप सिर्फ अपने आप से बोलते रहो कि मैंने तो फलां डिग्री ली है, ये किया है, वो किया है तो फिर उस बच्चे को जगाना मुश्किल है। अपने अंदर के बच्चे के अंदर जो मासूमियत है, उसके अंदर जो चार्म है, उसे जानना जरूरी है। आत्मा तो इंसानों में है, देश में है, उसके लोगों में है। तो ये भूल जाना चाहिए कि मैं क्या पढ़-लिखकर आया हूं। बदलाव के लिए यह समझना जरूरी है कि क्या आपने जिंदगी की पढ़ाई की है? इसीलिए मैं कहता हूं कि 'कुछ खास है हम सभी में, क्या स्वाद है जिंदगी में' तो इसका मतलब यही है कि हमें अपने अंदर के बच्चे को जिंदा रखना है, फिर भले ही दुनिया ये सिखाए कि ये मत करो, वो मत करो। कुल मिलाकर उस बच्चे को दबने नहीं देना है। 1993-94 में मेरे बनाए कैडबरी के उस विज्ञापन की खूबी भी यही थी। उसमें मैदान में अजीब ढंग से नाचती लड़की को देश को ऐसा ही लगा कि मैं अपने अंदर के बच्चे को जगा सकता हूं, मैं स्वयं को अभिव्यक्त कर सकता हूं। वह वक्त भी ऐसा ही था। उस समय हिंदुस्तान भी खुल रहा था। मुझे याद है कि, इस विज्ञापन के बाद कई मांओं ने हमें बोला कि हमें मैदान में उस लड़की को डांस करते देखकर खराब नहीं लगा, वास्तव में हम भी ऐसा ही करना चाहती थीं।' लोगों ने इस विज्ञापन को 'स्टेटमेंट ऑफ लिबरेशन' की तरह देखा, हालांकि जब इसे बना रहे थे ऐसा कोई इरादा नहीं था। मैं आज जब किसी कॉलेज में जाता हूं और वहां के 18-20 साल के बच्चे इस कैडबरी के विज्ञापन को देखते हैं तो वे इससे कनेक्ट कर लेते हैं, भले ही वे उस समय पैदा भी नहीं हुए थे जब ये बना था। वे ऐसे पागल हो जाते हैं कि ये तो उनके लिए बना हो, उनकी स्पिरिट हो।
पीयूष: बात जिंदगी में कुछ चुनने की आती है, दो राहों में से एक राह चुननी हो तो दिल और दिमाग में से दिल की सुननी चाहिए। अपने दिल और दिमाग को दो दोस्त की तरह मान लो जो एक मोटरसाइकिल पर जाते हैं। कभी दिल ड्राइविंग सीट पर होता है और दिमाग पीछे बैठता है और कभी इसका उलटा होता है। कभी दिमाग दिल को याद दिलाता है कि ज्यादा इधर-उधर मत भटको, कभी दिल दिमाग को कहता है कि ज्यादा मत सोचो। इसी तरह जिंदगी चलती है, दोनों दोस्त की तरह चलते हैं और दोनों ने एक-दूसरे से बहुत सीखा है। लेकिन, जब एक राह चुनने की बात आती है तो मेरी सोच यही है कि दिमाग को पीछे बिठा देना चाहिए और दिल को ड्राइविंग सीट संभालनी चाहिए। मुझे ऐसे में दिल का रास्ता ज्यादा पसंद है। एक किस्सा मुझे याद आता है कि मेरे क्रिकेट कॅरिअर के साथी अरुण लाल पहले एक टी-टेस्टर हुआ करते थे। उनके बुलावे पर मैं भी कॉलेज के बाद टी-टेस्टिंग का काम करने लगा। हमारी बातें बड़ी मजाकिया हुआ करती थी। एक दिन उसने कहा कि तुम इतनी अच्छी पंच-लाइन मारते हो कि विज्ञापन की दुनिया में तो ये हिट हो जाएंगी। मैंने उस समय तो गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन बाद में जब मैं ओएंडएम से जुड़ा तो लगा कि मेरी दुनिया तो यही है। लोगों को मजा आ जाए, ऐसी बात सुनाना। बस, फिर मैं यहीं का होकर रह गया।
पीयूष: मेरी जिंदगी में बहुत लोगों का महत्व रहा है लेकिन सबसे ज्यादा मां की भूमिका रही। वे मेरे लिए सबसे बड़ी प्रेरणास्रोत हैं। आज वे नहीं है, तो भी साथ हैं। उन्होंने ही प्रोत्साहन दिया कि, जाओ, जो करना है करो। जहां आप हद से ज्यादा बढ़ते थे तो याद भी वही दिलाती थी कि आप भटक रहे हो। हम लोग नौ भाई-बहन हैं, और उन सबको जोड़कर रखने का काम वही कर सकती थी। प्रोफेशनल जिंदगी में अच्छी पार्टनरशिप हमेशा एक फेविकोल के जोड़ की तरह होती है। हमारे बहुत पुराने, करीब 40 साल पुराने क्लाइंट्स हैं और उनके साथ रिश्ते एक विश्वास से जुड़े हैं। उन्होंने जो जिम्मेदारी दी, उसे हमनें पूरी ईमानदारी से निभाया और इसीलिए कहूंगा कि ताली दोनों हाथों से बजती है। मां से जुड़ा एक किस्सा याद आता है कि, जब प्रसून (छोटा भाई) और मैं दोनों ठीक-ठाक काम करने लगे थे। कमाई भी बढ़ रही थी। तभी सोचा कि मां को एक तोहफा देना है। बहनों ने कहा, मां को डायमंड बहुत पसंद है, लेकिन वह किसी से कहती नहीं। हमने ईयर रिंग देना तय किया, लेकिन कीमत इतनी थी कि एक अकेला भाई नहीं खरीद सकता था तो एक कान के लिए मैंने और दूसरे के लिए प्रसून ने खरीदी और मां को भेंट की, तो उनकी आंखों में जो खुशी के आंसू थे, वो मैं कभी नहीं भूल सकता।
पीयूष: मैं कुछ भी लिखने के पहले कागज पर 'ऊँ ' जरूर लिखता हूं और भगवान श्रीगणेश में बहुत आस्था रखता हूं। ज्यादा लोग नहीं जानते कि भगवान गणेश क्रिएटिविटी के भी देवता हैं और सरस्वती ज्ञान और कल्चर की देवी हैं। मुझे गणेश इसलिए भी बहुत पसंद है कि हमारे 33 करोड़ देवी-देवताओं में जितनी क्रिएटिव लिबर्टी गणेश के साथ है, उतनी किसी ओर के साथ नही और कोई माइंड नहीं करता। कभी गणेशजी क्रिकेट खेल रहे हैं, पुस्तक लिख रहे हैं, कुछ बजा रहे हैं। इतनी टॉलरेंस किसी और के साथ नहीं है और यह सबको पसंद आती है, कोई आपत्ति नहीं करता। मेरे पास अलग-अलग रूपों में बहुत से गणेशजी हैं। उनके रूप में इतनी क्रिएटिविटी है कि कुछ नया करने की प्रेरणा मिलती है और उनकी कृपा हमेशा बनी रहती है।
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पीयूष: मैंने कभी आने वाले कल की नहीं सोची। मैंने कोई कार्पोरेट सीढ़ी अपने दिमाग में कभी नहीं बनाई। जो काम आता है, उसे पूरे मन से करता हूं और फिर नतीजा जो होता है, वो मन का होता है। मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं ये बनना चाहता हूं, वो बनना चाहता हूं। जब तक मजा आ रहा है, बस, खेलते जाओ, इसी में मन की शांति है। एंजॉय द गेम।
2019 को भी 'फेविकोल' की उमर लग जाए। देश जुड़ा रहे। लोग जुड़े रहें। देश को न भूलें, अपने स्वाभिमान को न भूलें।
दैनिक भास्कर प्लस ऐप के पाठकों को बहुत शुभकामनाएं।
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