हम सबसे युवा देश, फिर फिटनेस के बजाय डायबिटीज में नंबर-1 क्यों?
सचिन तेंदुलकर गणतंत्र दिवस पर दैनिक भास्कर के विशेष अंक के गेस्ट एडिटर बने। इस मौके पर उन्होंने दैनिक भास्कर के ऑफिस से पाठकों के लिए संदेश दिया। पढ़ें उनका संदेश, उन्हीं के शब्दों में...
''कभी सोचा है आपने कि आपके रूम में पड़े बैडमिंटन रैकेट, टेनिस रैकेट, क्रिकेट बैट, फुटबॉल पर धूल क्यों जमा हो रही है? जब विराट को कवर ड्राइव लगाते देखते हैं, या सानिया का स्मैश, साइना का अनबिलिवेबल रिटर्न या सिंधू का ड्रॉप शॉट देखते हैं तो हम इतने एक्साइटेड क्यों हो जाते हैं? बस हमें ये देखना पसंद है। खुद कुछ नहीं करते। इसके आधार पर मेरी यह समझ बनी है कि हम खेलप्रेमी देश तो हैं, लेकिन खेलने वाला देश नहीं। क्योंकि, हम सब खुद खेलना नहीं चाहते, दूसरों को खेलते हुए देखकर खुश हो जाते हैं। खूब तालियां बजाते हैं, लेकिन बैठे रहते हैं अपने सोफे पर।''
''हमारे सामने आए कई सारे नंबर गर्व करने लायक नहीं हैं। जैसे डायबिटीज में हम दुनिया में नंबर-1 हैं। मोटापे में नंबर- 3 हैं। हम कहते हैं कि हम सबसे युवा राष्ट्र हैं। ऐसा कहते ही पहला ख्याल यही आता है युवा हैं तो फिट हैं। सबको ऐसा लगता होगा, पर मुझे नहीं लगता। क्योंकि, अगर हम सब फिट होते तो ये नंबर कुछ और होते। ये नंबर तभी बदलेंगे जब हमारी लाइफस्टाइल बदलेगी। बहुत सारे लोगों की आरामदायक लाइफस्टाइल है। कोई उन्हें कहे कि जिम में जाकर वर्कआउट करो तो वहां बार-बार घड़ी देखते हैं कि 10 मिनट हो गए। अगर प्लान किया हो 20 मिनट का तो 15 मिनट में ही जिम से बाहर निकल जाएंगे। लेकिन, यह बात डाइनिंग टेबल पर नहीं होती। सोचा कि 10 मिनट में खाना खाऊंगा तो 20 मिनट भी हो जाएं, पर वहां से हिलेंगे नहीं। यह बदलना जरूरी है। स्पोर्ट्स जिंदगी का सिर्फ देखने वाला हिस्सा नहीं, बल्कि खेलने वाला हिस्सा होना चाहिए।''
''मैंने बचपन से टीम स्पोर्ट्स खेलना शुरू किया। वहां से जब टीम इंडिया के लिए खेला, तब कभी किसी ने किसी तरह का भेदभाव नहीं किया। यह नहीं पूछा कि धर्म क्या है? जाति क्या है? ड्रेसिंग रूम में हम सब एक यूनिट थे। कैसे जीत सकते हैं, यही दिमाग में रहा। स्पोर्ट्स से टीमवर्क और अनुशासन सीखा। मैं शरारती होता था। अचानक एक शरारती लड़का डिसिप्लिंड लड़का बन गया। क्योंकि मेरी सारी एनर्जी अच्छी जगह चैनेलाइज हो रही थी। जब मैंने खेलना शुरू किया तो ये ख्वाब भी देखना शुरू कर दिया था कि एक दिन देश के लिए खेलना है। भारत को वर्ल्डकप जितवाकर देना है। इस सपने को पूरा करते-करते बहुत सारी चीजें सीखता चला गया। इसकी शुरुआत बचपन में ही हो चुकी थी। मेरे माता-पिता ने मुझे यह भी सिखाया कि खेलना भी पढ़ाई के जितना ही जरूरी है। मुझे पूरी छूट थी। लेकिन, सुविधाएं भी जरूरी हैं। मैं कहना चाहता हूं कि जहां भी मैदान खाली हैं, उन्हें खेलने के लिए खाली ही रखा जाए। उसके आजू-बाजू ही इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाना चाहिए।''
बेटा-बेटी में फर्क मिटाने को मांओं को ही आगे आना होगा :''मां फैमिली की बैकबोन होती है और महिलाएं देश के लिए भी रीढ़ जैसी हैं। मगर आज भी देश में कई जगह ऐसी हैं, जहां बेटों को सुविधाएं दी जाती हैं, बेटियों को नहीं। बेटों से कहेंगे कि स्कूल के बाद ये क्लास जाओ-वो क्लास जाओ। पर बेटी से कहेंगे कि मां की मदद करो। मुझे लगता है यह एटीट्यूड बदलना बेहद जरूरी है। इसके लिए मांओंको ही आगे आना होगा।''
बच्चों को फिट रखना है ताे स्कूलों में स्पोर्ट्स सब्जेक्ट हो: ''देश में स्पोर्ट्स कल्चर डेवलप करने के लिए स्कूलों में स्पोर्ट्स को सब्जेक्ट बनना जरूरी है। जूनियर केजी से ही स्पोर्ट्स के लिए रोज समय निकालना चाहिए। बच्चों को कहा जाना चाहिए कि 45 मिनट से 1 घंटे तक खेलना अनिवार्य होगा। इसका कोई विकल्प नहीं होना चाहिए। जब ऐसी लाइफस्टाइल बनेगी तो बच्चे ऑटोमेटिकली फिट होते जाएंगे। मुझे पता है कि जमाना बदल रहा है और जो हम 30-40 साल पहले करते थे वो चीजें अब नहीं रही हैं। लेकिन कहीं न कहीं हमें वीडियो गेम्स और बाहर जाकर खेलने में बैलेंस रखना होगा। बहुत से लोगों को और बच्चों को वीडियो गेम्स पसंद होता, पर अगर उसमें संतुलन रखेंगे तो उसका नतीजा अच्छा होगा।''
''बेटे और बेटी को लेकर हमारा व्यवहार एक जैसा कैसे हो ये बेहद जरूरी है। जब मां बाप ही भेदभाव करते हैं तो बच्चे का दिल छोटा हो जाता है। ये ठीक नहीं है। अपने पास लंबी लिस्ट है। अभी जो दिमाग में नाम आ रहे हैं उनमें पीटी उषा, कर्णम मल्लेश्वरी, अंजू बॉबी जॉर्ज, शाइनी विल्सन; अभी की जनरेशन में बात करें तो मैरीकॉम, दीपा करमाकर, साइना, सानिया, सिंधू और ये लिस्ट खत्म ही नहीं होती। सोचिए अगर इनके मां-बाप ने इन्हें छूट नहीं दी होती तो हमारे पास वो मेडल नहीं होते। हमारे पास सेलिब्रेट करने के लिए वो पल नहीं होते। पिछला ओलिंपिक ही देख लें जो मेडल लेकर आई उनमें एक सिंधू और एक साक्षी थीं।
मैं फिर कहता हूं कि हमारी सोच बदलनी चाहिए। हमें देखना होगा कि बेटा-बेटी दोनों को बराबर मौका कैसे दें। स्पोर्ट्स खेलने से ही हम स्वस्थ रहेंगे और हम सब स्वस्थ रहेंगे तो भारत स्वस्थ रहेगा। तो आओ सब स्वस्थ भारत बनाने की तरफ एक कदम बढ़ाएं और स्पोर्ट्स खेलना शुरू करें।''
मेरा मानना है कि स्पोर्ट्स क्लास के लिए इंसेंटिव मिलने चाहिए। मसलन अगर आप डिस्ट्रिक्ट खेलोगे, स्टेट खेलोगे या नेशनल लेवल के स्पोर्ट्स इवेंट में जाओगे तो एक्स्ट्रा मार्क्स दिए जाएंगे। हो सकता है तब ऐसे पैरेंट्स जो कहते रहते हैं कि सिर्फ पढ़ाई करो, वो भी कहेंगे कि खेलो और बोनस मार्क्स कमाओ।- सचिन
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