चित्रा मुदगल ने बताया- कृष्णाजी हमारे लिए एक सबक जैसी; कहती थीं- कम, गहरा और अच्छा लिखो

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भोपाल (आनंद देशमुख). हिंदी की मशहूर लेखिका कृष्णा सोबती का शुक्रवार को 93 साल की उम्र में निधन हो गया। चित्रा मुदगल ने उनके साथ बिताए अपने अनुभव दैनिक भास्कर मोबाइल ऐप के लिए साझा किए।उन्होंने बताया, "कृष्णा सोबती को लेकर बहुत सारी यादें हैं, जो आज उमड़ पड़ी हैं।उनका जानास्त्री लेखन की जीती जागती गौरव काया का जाना है। वे हम सब के लिए सबक जैसी रही हैं, क्योंकि वे कहती थीं कि कम लिखो, अच्छा और गहरा लिखो।"

"उन्होंने बहुत ज्यादा नहीं लिखा पर उनका लेखन स्त्री की दमित आकांक्षाओं को जिस तरह से रेखांकित करता रहा उसमें कहीं न कहीं स्त्री विमर्श को केंद्र में लाने की जद्‌दोजहद थी। उन्होंने पहले 'सूरजमुखी अंधेरे के' लिखा, फिर 'डार से बिछुड़ी' लिखा, 'मित्रो मरजानी' लिखा। आप पाएंगे कि ये तीनों उपन्यास आधी दुनिया के उस सपने के सच को बाहर लाकर, ढालकर लिखी गई लंबी कहानियां हैं। शुरुआत में वे लंबी कहानियों के रूप में छपी थीं। बाद में उन्हें लघु उपन्यास का नाम दिया गया। 'सूरजमुखी..' में नायिका का व्यक्तित्व यौन शोषण के मनोवैज्ञानिक भय में जीता हुआ लगता है।"

"वह जीवनभर उसे जीकर अंत में ही उससे उबर पाती है। यानी वह उसी मानसिकता में जीती है, जैसे एक आम स्त्री जीती हैं। 'डार से बिछुड़ी में' उन्होंने यह विषय लिया कि जब स्त्री को भोग की वस्तु समझा जाता है यानी जब वह जीवन की डोर से बिछड़ती है तो वह क्या महसूस करती है। लेकिन, वहीं नायिका जब मित्रो मरजानी में 'मित्रो' के रूप में उभरती है। वह पुरुष शोषणा की शिकार नहीं है। वह अपनी इच्छाओं को लेकर प्रखर व मुखर होती है। वह अपनी सास, पति व परिवार से कहती है 'यह लीला इसके वश की बात नहीं है।"

"अपने बेटे को किसी वेद-हकीम को दिखाओ।' हिंदी साहित्य में कोई स्त्री पात्र इतनी मुखरता से सामने नहीं आया। उन्होंने सिर्फ बिम्ब खड़ाकर यह बता दिया कि आज औरत वह बोल रही है, जो वह चाहती है। इसके बाद जब 'ऐ लड़की' आता है तो वह सब चीजें समझती है। वह आत्मनिर्भर लड़की हो चुकी है। उसकी मां जब कहती है कि बेटी का जीवन तब तक सफल नहीं होता, जब तक उसकी गोद नहीं भरती, तो वह कहती है कि उसे इसकी जरूरत नहीं है। इस प्रकार कृष्णाजी की स्त्री का व्यक्तित्व विकसित होता जाता है।

सिक्का बदल गया कहानी विश्व मंच पर रखी जाए :उन्होंने बताया-"कृष्णाजी ने भले ही पंद्रह-सोलह कहानियां लिखी हो पर उनकी कहानी 'सिक्का बदल गया' के बारे में मैं डंके की चोट पर कहती हूं कि विभाजन के ऊपर मैंने ऐसी कहानी नहीं पढ़ी। जब एक राष्ट्र दो राष्ट्रों बंट जाता है तो सिक्का बदल जाता है। फिर लोग उसी लोकजीवन को जीने के बावजूद अपने आपको अलग स्थितियों में पाते हैं। मुझे लगता है कि विश्व की बड़ी कहानियों में इसे दर्ज किया जाना चाहिए। बहुत से देशों के अंतर्विलाप है विभाजन के। यह उन सबको व्यक्त करती है। हमारे यहां इतना उत्साह होना चाहिए कि अनुवाद के जरिये ऐसी कृतियों को विश्व पटल पर रखें।"



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Krishna always used to say less, write deep and good

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