भाजपा 2014 को दोहरा नहीं पाएगी, पार्टी के लोग भी 100 सीट कम होने की बात कर रहे हैं: अनुराधा
वरिष्ठ पत्रकार अनुराधा प्रसाद मानती हैं कि महागठबंधन हो गया तो आगामी लोकसभा चुनाव में कांटे की टक्कर होगी। बीजेपी 2014 को दोहरा नहीं पाएगी। चुनावों के ऐसे ही अहम मुद्दों पर भास्कर के संतोष कुमार ने उनसे खास बातचीत की। पढ़िए मुख्य अंश :
सवाल :क्या 2019 में मोदी को हरा पाना मुश्किल है?
जवाब :महागठबंधन बनेगा कि नहीं बनेगा, यह सवाल हरेक के मन में है। अभी विपक्ष बिखरा हुआ है। गठबंधन समय के हिसाब से होता है। आज से चार साल पहले तेलंगाना के सीएम को लगा होगा कि बीजेपी के साथ रहना अच्छा है। चंद्राबाबू नायडू को भी यही लगा होगा, लेकिन आज स्थिति बदली हुई है। खासकर रीजनल पार्टियों का कल्चर बन गया है कि वे सबकुछ अपने हिसाब से तय करती हैं। आज की बीजेपी बहुत मजबूत है, सार्वभौम है। 2019 के संदर्भ में मोदी सबसे कद्दावर नेता हैं। मोदी की ब्रांडिंग इस तरह से की गई है कि दूसरा कोई भी एक चेहरा उनके सामने नहीं दिख रहा है।
सवाल :यूपी में सपा-बसपा का गठबंधन हो पाएगा?
जवाब :बीएसपी की चिंता एससी-एसटी एक्ट वाले मसले के बाद बढ़ी है कि हमारा वोट बैंक खिसक न जाए। लेकिन वोट हस्तांतरण के लिए किसी भी गठबंधन को कम से कम 6 महीना तो एक साथ दिखना चाहिए। आधा तीतर, आधा बटेर आप नहीं कर सकते। 2014 में लहर थी। उसे मोदीजी ने बहुत अच्छे से कैप्चर किया। चुनावी अनुभव के आधार पर कह सकती हूं कि लगता नहीं कि 2014 रिपीट हो पाएगा। गठबंधन हो जाएगा तो कांटे की टक्कर रहेगी।
सवाल :यूपी, एमपी, राजस्थान, गुजरात जैसे बड़े राज्यों से बीजेपी को अपनी 50% सीटेंमिली थीं। भाजपा यहां सीटें गंवाती है तो कहां से भरपाई होगी?
जवाब :निश्चित तौर से बीजेपी पूर्वोत्तर से भरपाई कर सकती है। कुछ सीटें पश्चिम बंगाल से ला सकती है, वहां वो बढ़ी है। आंध्र में निर्भर करता है कि वह किसके साथ गठबंधन करती है। अगर जगनमोहन रेड्डी के साथ जाती है तो वहां से भी लाभ होगा। तमिलनाडु में अभी स्पष्टता नहीं है। 2014 के समान सीटें तो बीजेपी को नहीं आएंगी और मुझे भरोसा है कि बीजेपी के लोग भी अंदरुनी तौर पर यह मानते हैं। सौ सीटें तो वैसे भी वो घटा रहे हैं।कुछ जेडी-यू से मिलेगा और हो सकता है कि कुछ पार्टियां चुनाव बाद साथ में आ जाएं।
सवाल :आरोप हैकि मोदी सरकार में सांप्रदायिकता और कट्टरता बढ़ी है?
जवाब :कट्टरता तो बढ़ी है। मैं सांप्रदायिकता की बात नहीं करती, लेकिन समाज में दोनों तरफ से कट्टरता बढ़ी है। लेकिन इसकी एकमात्र वजह सरकार या संगठन नहीं है। इसकी एक वजह और भी है जो मैं सोचती हूं, पिछले 4-5 साल में स्मार्टफोन के जरिए एक अजीब-सी सशक्तीकरण की क्रांति आई है। जो बच्चा गांव के स्कूल में छठवीं के बाद नहीं पढ़ा उसे भी लगता है कि मैं सशक्त हो गया हूं। मुझे लगता है कि कट्टरता बढ़ी है, क्योंकि हाफ एजुकेशन, हाफ नॉलेज ज्यादा खतरनाक है। जिस तरह सोशल मीडिया पर चीजें बना-बनाकर चलाई जाती हैं उसने निश्चित तौर से इसे बढ़ावा दिया है।
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