भाजपा खोएगी करीब 100 सीटें, फिर भी मोदी होंगे प्रधानमंत्री: वीर सांघवी
ऑक्सफोर्ड से पॉलिटिक्स और इकोनाॅमी की पढ़ाई कर चुके वीर सांघवी भारतीय पत्रकारिता में जाना-माना नाम हैं। दैनिक भास्कर के मुकेश कौशिक से बातचीत में उन्होंने कहा आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा अपनी 100 सीटें खोएगी। उनसे बातचीत के मुख्य अंश-
सवाल:यूपी, एमपी, राजस्थान, गुजरात जैसे बड़े राज्यों से बीजेपी को 50% सीटेंमिली थीं। भाजपा यहां सीटें गंवाती है तो कहां से भरपाई होगी?
जवाब:ऑरिजनल आइडिया यह था कि असम से काफी सीटों की भरपाई हो जाएगी। कुछ सीटें यहां से आएंगी, लेकिन स्वीप नहीं होगी। भाजपा को लगता था कि कर्नाटक से भरपाई होगी। पर मुझे ऐसा होता नहीं लग रहा। नॉर्थ-ईस्ट पर भी निगाह है, लेकिन वहां काफी सीटें नहीं हैं। नॉर्थ ईस्ट की ज्यादातर पार्टियां भाजपा के पक्ष में नहीं, बल्कि अपने लिए काम करती हैं और अगर अपोजिशन का एलायंस बना तो वो उसके साथ चली जाएंगी। ऐसे में किसी भी सूरत में भाजपा पिछली सीटों के बराबर नहीं ला पाएगी। मेरा अनुमान कहता है कि उनकी 80 से 100 सीटें कम होंगी। भाजपा एक मजबूत मंच के तौर पर सामने नहीं आ पाएगी।
सवाल: और पश्चिम बंगाल से?
जवाब:वहां से हद-ब-हद पांच छह-सीटें आ सकती हैं। इससे क्या फर्क पड़ता है।
सवाल: प्राइम मिनिस्टर के तौर पर राहुल गांधी कैसे रहेंगे?
जवाब: कांग्रेस इस बारे में अपनी रणनीति बना चुकी है। राहुल गांधी खुद ऐसा नहीं चाहते। राहुल गांधी ने भांप लिया है कि मोदी इसे उनके और मेरे बीच प्रेसिडेंशियल इलेक्शन के रूप में तब्दील करना चाहते हैं। राहुल ऐसा नहीं होने देना चाहते। वह इसे मोदी बनाम यूनाइटेड अपोजिशन ही रखना चाहते हैं। मुझे लगता है कि प्राइम मिनिस्टर बनने के लिए राहुल गांधी दस साल का इंतजार करने को भी तैयार हैं।
सवाल:आरोप हैं कि मोदी सरकार में सांप्रदायिकता और कट्टरता बढ़ी है?
जवाब:यह परसेप्शन एकदम सही है। इसमें कोई शक नहीं है कि पांच-छह साल पहले के मुकाबले आज सोशल टेंशन बहुत बढ़ गया है। औसत भारतीय मुसलमान आज असुरक्षित महसूस करता है। शेष | पेज 8 पर
मैं निजी तौर पर कई मुसलमान परिवारों को जानता हूं जो अपने बच्चों को विदेश जाकर स्टडी करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं और कह रहे हैंं कि वहीं बस जाना, यहां लौटकर मत आना। बदतर बात यह है कि ज्यादातर नफरत सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही है। इनमें से अनेक लोग हैं, जिन्हें पीएम फालो करते हैं। ऐसे एलीमेंट्स हैं, जो कहते हैं कि गांधी और गोडसे में से चुनना हो तो वे गोडसे को फाॅलो करेंगे। इनमें से कई चेहरे ऐसे हैं जो साफतौर से आरएसएस या
उसके साथी संगठनों के हैं, लेकिन उन पर अंकुश लगाने की कोई कोशिश नहीं होती।
सवाल:चेहराविहीन विपक्ष मोदी का सामना कर पाएगा?
जवाब: मुझे ऐसा नहीं लगता। विपक्ष चुनाव जीतता नहीं है। सरकारें चुनाव हारती हैं। जैसे ही आप राहुल गांधी को चेहरे के तौर पर पेश करेंगे तो आप मोदी के लिए एक टारगेट फिक्स करते हैं। आप इस पर अटैक करें कि मोदी का प्रदर्शन कितना खराब रहा तो विपक्ष पर अटैक के चांस कम हो जाएंगे। मुझे लगता है कि विपक्ष इसी स्ट्रैटेजी पर चल रहा है।
सवाल:कांग्रेस के पास मोदी सरकार के खिलाफ क्या मुद्दे हैं?
जवाब:विपक्ष सबसे अधिक जोर इकोनॉमी पर देगा। आप कोई भी तर्क दें, या सरकार कितने ही आंकड़े गिनाए, लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि एवरेज पर्सन ये नहीं मानता कि इकोनॉमी में सुधार हुआ है। इकोनाॅमी को लेकर लोगों में निराशा है और विकास के जो वादे किए गए थे वे पूरे नहीं हो पाए। विपक्ष इसे लेकर चोट करेगा। विपक्ष ये भी जोरों से बताएगा कि मोदी आम आदमी के दोस्त नहीं, बल्कि बिग बिजनेस के पॉकेट में हैं। रफाल डील का मुद्दा काम करेगा या नहीं करेगा कह नहीं सकते। पर अनिल अम्बानी पर लगातार अटैक के अलावा 'सूटबूट' वाला मुहावरा काम करता दिख रहा है। विपक्ष यह भी साबित करने में काफी हद तक सफल रहा है कि नोटबंदी से आम आदमी का भला नहीं हुआ और ब्लैकमनी से निजात पाने में कोई कामयाबी नहीं मिली। यानी विपक्ष का अटैक मोदी सरकार के रिकॉर्ड पर होगा। मुझे नहीं लगता कि विपक्ष सोशल टेंशन पर ध्यान देगा। विपक्षी खेमे में यह धारणा है कि अगर हिंदू-मुस्लिम तनाव को मुद्दा बनाया तो यह भाजपा के हाथों में खेलना है, क्योंकि ऐसे में वह यह बता पाएगी कि हिंदुओं की पार्टी भाजपा है और इस्लामी ताकतों से खतरा है।
सवाल:और 2019में भाजपा क्या मुद्दा लेकर चुनाव में जाएगी?
जवाब:मुझे वाकई हैरानी है कि भाजपा किस मुद्दे पर चुनाव लड़ेगी। एक आॅप्शन यह है कि पार्टी आइडेंटिटी इश्यू को उठाए जो आडवाणी की आॅरिजनल भाजपा के समय उठाए गए थे। आप ऐसे में मंदिर के बारे में ज्यादा सुन रहे हैं, पाकिस्तान की ओर से खतरे की बात उठेगी। दूसरी बात यह सामने आएगी कि मिस्टर मोदी पर्सनली बहुत सिन्सियर पर्सन हैं। यह सही भी है कि मोदी की अपनी लोकप्रियता बरकरार है। मुझे यह साफ लगता है कि मोदी इस चुनाव को प्रेसिडेंशियल कॉन्टेस्ट में बदलना चाहते हैंं। जिसमें यह प्रोजेक्ट किया जाए कि मुकाबला उनके और राहुल गांधी के बीच है, जो उनके जितने ब्राइट नहीं हैं। लेकिन असली फैसला तो यूपी जैसे स्टेट से होगा, जहां भाजपा की टक्कर कांग्रेस से नहीं हैं। वहां जाकर अगर वे मुलायम, अखिलेश या मायावती के वोटर से यह कहें कि राहुल गांधी तो इडियट है, तो इससे क्या फर्क पड़ता है।
सवाल:मोदी सरकार की दो बड़ी कामयाबी और दो असफलताएं बताइए?
जवाब:मोदी सरकार ने उस पॉलिसी पेरेलेसिस को दूर किया जो मनमोहन सिंह के कार्यकाल के मध्य में आ गया था। निर्णय नहीं लिए जाते थे। मनमोहन सिंह खुद बहुत अच्छे इंसान हैं, लेकिन उनके सरकार पर लग रहे भ्रष्टाचार के आरोपों का वे जवाब नहीं दे पाए थे। मोदी ने करप्शन को काउंटर किया। निर्णय लेने की ताकत दिखाई। फाइलें मूव होने लगीं। उनकी सबसे बड़ी विफलता यह है कि उन्होंने ओवर प्रॉमिस किए। वह कभी सेंटर में मंत्री नहीं रहे थे। उन्हें नहीं पता था कि देश कैसे चलाया जाए। उन्हें लगा कि देश को गुजरात की तरह चलाया जा सकता है। लिहाजा उन्हें लगता था कि जो कहेंगे वह डिलीवर कर देंगे। मनमोहन सिंह ने जब शासन छोड़ा तो इस सरकार से बहुत उम्मीदें थीं। पेट्रोल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें भी मोदी के पहले साल में कम थीं। ऐसे में लगता था एवरेज इंडियन की लाइफ सुधर जाएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। दूसरी बड़ी विफलता यह है कि मोदी ने भारत को जितना डिवाइड किया, हिस्ट्री में किसी और पीएम ने इतना डिवाइड नहीं किया। उन्होंने यूपी के सीएम के तौर पर योगी को चुने जाने दिया। उनके मंत्रियों के बयान देख लीजिए। गोरक्षकों को चतुराई भरा समर्थन दिया जाता रहा। अगर वे दोबारा चुने जाते हैं तो यह डिवाइड और भी बदतर हो जाएगा।
सवाल:नोटबंदी,जीएसटी को आप कैसे देखते हैं। क्या ये सफल हैं?
जवाब: इसमें शक नहीं है कि ट्रेडर्स इस बात से खफा हैं, जिस तरह से जीएसटी लागू किया गया है। छोटे दुकानदार भी परेशान हैं। यह जनसंघ का आॅरिजनल बेस था। देखना यह है कि क्या यह चुनाव में भाजपा के खिलाफ गुस्से में तब्दील होगा। नोटबंदी वाकई एक बड़ी प्राॅब्लम साबित होगी। भले ही यह कहा जाए कि जीएसटी और नोटबंदी का कोई असर मोदी की लोकप्रियता पर नहीं पड़ा है तो यह गलत बात है। यह धारणा सिर्फ यूपी के इलेक्शन के बाद बनाई गई जहां भाजपा ने बढ़िया जीत हासिल की। यह चुनाव नोटबंदी के फौरन बाद हुआ था। लेकिन इसके बाद के चुनावों को देखें तो भाजपा ने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया।
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