70 साल में 8 बार जेपीसी का गठन, 5 बार सरकार अगला आम चुनाव हार गई
नई दिल्ली.संसद का शीतकालीन सत्र शुरू हुए 4 दिन हो गए हैं, लेकिन एक भी दिन दोनों सदनों में सुचारू रूप से कामकाज नहीं हो सका है। वजह, रफाल डील है। कांग्रेस समेत पूरा विपक्ष केंद्र सरकार से रफाल डील को लेकर ज्वाॅइंट पार्लियामेंट कमेटी (जेपीसी) के गठन की मांग कर रहा है। पर, सरकार इस पर राजी नहीं है।
हालांकि केंद्र सरकार शुरू से कह रही है कि वह इस मुद्दे पर दोनों सदनों में चर्चा के लिए तैयार है। इस बीच शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने रफाल डील पर अपना फैसला सुनाते हुए सरकार को सभी आरोपों से बरी कर दिया। इसके बाद सदन में पूरी सरकार काफी उत्साह में नजर आई। हालांकि फैसले के बाद देर शाम कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर दोबारा जेपीसी के गठन की मांग कर दी। ऐसे में विपक्षी दल सवाल उठा रहे हैं कि आखिर मोदी सरकार जेपीसी का गठन करना क्यों नहीं करना चाहती है।
अब तक देश के 70 साल के संसदीय इतिहास में 8 बार किसी मामले को लेकर सरकार ने जेपीसी का गठन किया है। इसमें से पांच बार ऐसा हुआ, जब सत्तारूढ़ दल अगला आम चुनाव हार गई। सबसे पहले 1987 में राजीव गांधी सरकार ने बोफोर्स तोप खरीद मामले में जेपीसी का गठन किया था। इसके बाद 1989 में कांग्रेस आम चुनाव हार गई। इसके बाद 1992 में पीवी नरसिंहराव सरकार ने सुरक्षा एवं बैंकिंग लेन-देन में अनियमितता को लेकर जेपीसी का गठन किया। तब 1996 में हुए आम चुनाव में कांग्रेस हार गई। एक कार्यकाल में सबसे ज्यादा दो बार जेपीसी का गठन पिछली मनमोहन सिंह और मौजूदा मोदी सरकार में हुआ। 2003 में वाजपेयी सरकार ने भी जेपीसी का गठन किया था।
क्या है जेपीसी
ज्वाइंट पार्लियामेंटरी कमेटी(जेपीसी) में दोनों सदनों के सदस्य होते हैं। जेपीसी का गठन सरकार बेहद गंभीर मामलों में ही करती है। समिति ऐसे किसी भी व्यक्ति, संस्था से पूछताछ कर सकती है, जिसको लेकर उसका गठन हुआ है। यदि वह जेपीसी के समक्ष पेश नहीं होता है तो यह संसद की अवमानना मानी जाएगी। जेपीसी संबंधित मामले में लिखित, मौखिक जवाब या फिर दोनों मांग सकती है। लोकसभा के पूर्व महासचिव व संविधान विशेषज्ञ पीडीटी आचारी बताते हैं कि इसमें अधिकतम 30-31 सदस्यों की नियुक्ति होती है। समिति का चेयरमैन बहुमत वाली पार्टी के सदस्य को बनाया जाता है। समिति में शामिल सदस्यों में बहुमत वाले राजनीतिक दल के सदस्यों की संख्या भी अधिक होती है। समिति के पास मामले की जांच के लिए अधिकतम समय सीमा 3 महीने होती है। इसके बाद उसे अपनी रिपोर्ट संसद के समक्ष पेश करनी होती है।
अब तक हुआ क्या हैबहुमत के चलते हमेशा फैसला सरकार के पक्ष में आता है, पर चुनाव में होता है असर :जेपीसी में बहुमत से फैसला होता है। समिति में सबसे ज्यादा लोग सत्तारूढ़ पार्टी के होते हैं, ऐसे में अक्सर निर्णय सरकार के पक्ष में ही आता है। जैसे, 2जी मामले में हुआ। रिपोर्ट में सरकार को क्लीनचिट मिली, पर कोर्ट में चोरी पकड़ी गई। असर, 2014 चुनाव में हुआ।
क्यों कर रही भाजपा विरोधपीएम मोदी से होगी सीधे पूछताछ, इसलिए सरकार नहीं करना चाहती गठन :जेपीसी के पास असीमित अधिकार होते हैं। चूंकि यह मामला सीधे प्रधानमंत्री से जुड़ा हुआ है। ऐसे में यदि जेपीसी बनाई गई तो मोदी से भी सवाल हो सकता है। इसीलिए सरकार जेपीसी के गठन से बच रही है। तर्क, संवेदनशील जानकारियों का दे रही है।
जेपीसी ने अब तक इन मामलों की जांच की है
| गठन | मामला | नतीजा |
| 1987 | बोफोर्स तोप सौदा | 1989 में कांग्रेस हारी |
| 1992 | सुरक्षा एवं बैंकिंग लेन-देन | 1996 में कांग्रेस चुनाव हारी |
| 2001 | स्टॉक मार्केट स्कैम | कोई असर नहीं हुआ |
| 2003 | साॅफ्ट ड्रिंक,जूस में पेस्टीसाइड | अटल सरकार चुनाव हारी |
| 2011 | 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला | 2014 में कांग्रेस हारी |
| 2013 | वीवीआईपी चॉपर घोटाला | कांग्रेस हार गई चुनाव |
| 2015 | भूमि अधिग्रहण,पुनर्वास बिल | नतीजा नहीं |
| 2016 | एनआरसी | नतीजा नहीं |
2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की जांच के लिए गठित जेपीसी में 30 सदस्य थे। 15 सदस्यों ने समिति के अध्यक्ष पीसी चाको को ही हटाने की मांग कर दी थी। वहीं, जेपीसी का गठन ज्यादातर घोटालों को लेकर हुआ है। हालांकि मोदी सरकार में जेपीसी घोटालों को लेकर नहीं बनी।
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