पांच अफसर, 25 वर्ष, 121 तबादले सरकार कोई भी, ईमानदार परेशान

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पवन कुमार, नई दिल्ली.'मुझे तो सब पुलिस वालों की सूरतें एक जैसी लगती हैं'। शोले के इस डॉयलाॅग का जिक्र करते हुए एक अधिकारी ने कहा कि हमारे साथ भी ऐसा ही है। सरकारें बदल जाती हैं लेकिन रवैया नहीं बदलता। जैसे जब बीजेपी हरियाणा में विपक्ष में थी तब आईएफएस ऑफिसर संजीव चतुर्वेदी की खूब तारीफ करती थी। लगातार आरोप लगाती थी कि एक ईमानदार अधिकारी को कांग्रेस परेशान कर रही है। लेकिन जब वो खुद सत्ता में आई तो उसने भी चतुर्वेदी की परवाह नहीं की।

भास्कर ने ऐसे ही 5 अधिकारियों के करियर की पड़ताल की तो यह सामने आया कि सरकारें कैसे इन्हें परेशान करती रही हैं।किसी अधिकारी का ट्रांसफर होना बड़ी बात नहीं है, लेकिन अगर ट्रांसफर की संख्या नौकरी के सालों से दोगुनी हो जाए तो यह कहा जा सकता है कि सरकार नाराज हो तो ट्रांसफर परेशान करने के लिए भी किया जाता है।

चार्जशीट दायर करना, काम न देना, साइडलाइन पद पर बैठा देना, परेशान करने के कुछ अन्य तरीके हैं। खास बात यह है कि 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका पर फैसला लिया कि भारतीय सेवा के अधिकारियों का किसी भी पद पर कार्यकाल दो साल होना चाहिए और दो साल से पहले उनका तबादला नहीं किया जाना चाहिए। इस फैसले का भी असर होता नजर नहीं आ रहा है। कुछ ही अधिकारी हैं जिन्होंने इस फैसले के आधार पर अपने तबादलों को चुनौती दी हो।

राजू नारायणस्वामी (आईएएस) :

केरल कैडर के आईएएस राजू नारायणस्वामी को केरल का अशोक खेमका कहा जाता है। स्वामी के पिछले 22 वर्ष में 20 ट्रांसफर हो चुके हैं। केरल में लेफ्ट की सरकार रही तब भी और जब कांग्रेस सरकार रही तब भी इन्होंने अपना सख्त रुख जारी रखा। इसीलिए ज्यादातर समय साइडलाइन वाली पोस्ट पर रखा गया।

केरल के पीडब्ल्यूडी मंत्री टी.यू. कुरुविल्ला ने अपने बच्चों के नाम पर सरकारी जमीन का गलत तरीके से सौदा किया, जिसकी जांच स्वामी ने की। इनकी रिपोर्ट के आधार पर मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। इन्होंने अतिक्रमण करने पर अपने ससुर के खिलाफ भी कार्रवाई की।

त्रिशूर के जिलाधिकारी रहते हुए सड़कों पर अतिक्रमण बुलडोजर से तुड़वाया तो इन्हें बुलडोजर कलेक्टर कहा जाने लगा। केन्द्र सरकार ने स्वामी को जनवरी 2017 में कोकोनट डेवलपमेंट बोर्ड का चेयरमैन चुना लेकिन जुलाई 2018 तक नियुक्ति नहीं हुई। बाद में केरल हाईकोर्ट के आदेश पर चेयरमैन बने। यहां भी उन्होंने करोड़ों रुपए के घोटाले का पर्दाफाश किया। उन्हें जान से मारने की धमकी मिल रही है और पद से हटने का दबाव बनाया जा रहा है।

अशोक खेमका (आईएएस) :
हरियाणा कैडर के आईएएस अधिकारी अशोक खेमका को पहले कांग्रेस की हुड्‌डा सरकार ने खूब परेशान किया और कई ट्रांसफर किए, चार्जशीट दर्ज कीं। उन्होंने रॉबर्ट वाड्रा की लैंड डील में वाड्रा को बेची गई भूमि का म्यूटेशन रद्द कर दिया था। हरियाणा बीज निगम में कथित घोटाले की जांच की और मामला सीबीआई को भेजा।

विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने इन मुद्दों पर खूब राजनीति की। अक्टूबर-2014 में हरियाणा में भाजपा सरकार आई तब भी खेमका के खिलाफ चार्जशीट दर्ज की गई। भाजपा सरकार ने पहले तो खेमका को ट्रांसपोर्ट कमिश्नर बनाया लेकिन उनकी सख्ती देख आर्कयोिलॉजी में भेज दिया।

फिर वे साइंस और टेक्नोलॉजी में डेढ़ वर्ष रहे और फिर सोशल जस्टिस डिपार्टमेंट में ट्रांसफर कर दिया गया। खेमका को करीब ढाई वर्ष तक लगभग बिना काम के भी रखा गया। अब पिछले एक वर्ष से स्पोर्ट्स डिपार्टमेंट में हैं। जबकि मोदी सरकार आने के बाद खेमका को प्रधानमंत्री कार्यालय लाने की चर्चा थी, लेकिन इस पर पीएमओ मौन है। खेमका के 27 वर्षों में 51 ट्रांसफर हो चुके हैं।

पंकज चौधरी (आईपीएस) :
राजस्थान कैडर के आईपीएस अधिकारी पंकज चौधरी उस समय चर्चा में आए जब कांग्रेस की तत्कालीन गहलोत सरकार ने उन्हें जैसलमेर के एसपी पद से हटाया था। सरकार की ओर से कहा गया कि यह रुटीन ट्रांसफर है लेकिन असल कारण था कांग्रेस के करीबी रहे गाजी फकीर की हिस्ट्री शीट खोलना।

इस पर राजनीति करने वाली भाजपा ने ही सत्ता में आने पर भाजपा नेताओं की मांग पर उन्हें बूंदी का एसपी बनाया। पंकज चौधरी के काम-काज का तरीका नहीं बदला और सख्ती जारी रही। इस बार उन्होंने नैनवां के खानपुरा गांव में दो समुदायों में हुए विवाद और तोड़-फोड़ में हिन्दू संगठन के कुछ लोगों को गिरफ्तार किया।

इसके बाद उन्हें भापजा सरकार ने एसपी पद से हटा दिया। कुछ दिनों तक उन्हें प्रतीक्षा (एपीओ) में रखा गया। उसके बाद उनका ट्रांसफर दिल्ली में राजस्थान आर्म्ड फोर्स की थर्ड बटालियन में कर दिया गया और अलग-अलग कारण बता कर छह बार चार्जशीट की गई। वर्तमान में पंकज चौधरी जयपुर में क्राइम रिकाॅर्ड ब्यूरो में एसपी पद पर हैं। इस पद को भी साइडलाइन ही माना जाता है। चौधरी के 9 साल में 9 तबादले हुए।

अमिताभ ठाकुर (आईपीएस) :
जब अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे तब मुलायम सिंह यादव ने आईपीएस अमिताभ ठाकुर को फोन पर धमकी दी थी, इसके बाद ठाकुर ने मुलायम के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई थी। इसके दो दिन बाद ही उन्हें निलंबित कर दिया गया। ठाकुर पर बलात्कार और आय से अधिक संपत्ति का मुकदमा दर्ज हुआ। पत्नी पर भी मुकदमा दर्ज हुआ। जांच हुई तो आरोप झूठे साबित हुए। आय से अधिक संपत्ति वाले मामले की रिपोर्ट सरकार के पास लंबित है।

मुलायम सिंह वाले मामले में बार-बार कहने के बाद भी यादव ने आवाज के नमूने नहीं दिए लेकिन अब उत्तर प्रदेश पुलिस ने उस मामले में क्लोजर रिपोर्ट फाइल कर दी है और कहा है कि मुलायम सिंह के खिलाफ कोई मुकदमा नहीं बनता है बल्कि झूठी एफआईआर कराने पर अमिताभ ठाकुर पर ही प्राथमिकी दर्ज होनी चाहिए, जिसके विरुद्ध में ठाकुर ने अदालत में अपील की है। समाजवादी पार्टी की सरकार में ठाकुर की पोस्टिंग रूल्स मैन्युअल डिपार्टमेंट में थी। अब वे सिविल डिफेंस में आईजी के पद पर हैं। ठाकुर का 25 साल में 26 बार ट्रांसफर हुआ।

संजीव चतुर्वेदी (आईएफएस) :
वन विभाग में हुए भ्रष्टाचार को उजागर करने पर भारतीय वन सेवा अधिकारी संजीव चतुर्वेदी को पहले हरियाणा की हुड्‌डा सरकार ने परेशान किया। शुरुआती 5 साल में ही 12 बार तबादला हुआ। 16 साल में कुल 15 तबादले हुए। कई बार एेसी जगह पोस्टिंग हुई कि 40 फीसदी नौकरी तो बिना काम के ही करनी पड़ी। तबादला, निलंबन के साथ-साथ चार्जशीट कीं और नौकरी से निकालने की कार्रवाई शुरू की।

चतुर्वेदी के खिलाफ झूठे मुकदमे भी दर्ज कराए गए। दो बार देश के राष्ट्रपति ने चार्जशीट रद्द की। तब विपक्ष में रहते हुए भाजपा ने संजीव की खूब तारीफ की और हरियाणा के भाजपा नेता जो वर्तमान में मंत्री हैं ने कहा था भ्रष्टाचार यदि कैंसर है तो संजीव चतुर्वेदी उसकी दवा हैं। जब केन्द्र और राज्य में भाजपा की सरकार आई तब भी संजीव वैसे ही परेशान हैं।

केंद्र में प्रतिनियुक्ति के दौरान 2015-16 में उनके काम-काज के लिए उन्हें जीरो नंबर दिए गए, जिसके लिए संजीव उत्तराखंड से लेकर दिल्ली तक अदालती लड़ाई लड़ रहे हैं। खास बात यह है कि इसी दौरान अपने काम के लिए उन्हें मैग्से से अवॉर्ड से सम्मानित किया है।

वो चाहते हैं कि मामले की सुनवाई उत्तराखंड में ही हो जबकि केंद्र का कहना है कि दिल्ली में सुनवाई हो। उधर हरियाणा की भाजपा सरकार राष्ट्रपति द्वारा रद्द चार्जशीट के खिलाफ अदालती लड़ाई लड़ रही है और कह रही है कि हुड्डा सरकार ने जो चार्जशीट की थी वह बिल्कुल सही है। हरियाणा में संजीव की जान को खतरा देखते हुए 2014 में कैडर हरियाणा से उत्तराखंड किया गया था।



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Government officials troubled by transfer

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