किसानों का कर्ज ‘वेकऑफ’, यह सरकारें चुकाती हैं; कारोबारियों का कर्ज ‘राइट ऑफ’, वसूली की कोशिशें करता रहता बैंक
हाल में कांग्रेस द्वारा जीते मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ व राजस्थान में मुख्यमंत्रियों ने कुर्सी संभालते ही किसानों की कर्जमाफी का एेलान कर दिया है। मगर देश के कई बड़े अर्थशास्त्री इसे कृषि अर्थव्यवस्था के लिए गलत बता रहे हैं। रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन भी इनमें से एक हैं। राजन ने तो चुनाव आयोग को एक पत्र लिखकर एेसी घोषणाओं पर रोक की मांग कर दी है।
उन्होंने लिखा है कि कर्जमाफी राजनीतिक दलों के मेनिफेस्टो में न हो। इधर, किसानों की कर्जमाफी के एेलान को जायज ठहराते हुए नेताओं ने दलील दी कि- जब व्यापारियों-उद्योगपतियों का कर्ज माफ किया जा सकता है तो किसानों का क्यों नहीं?वैसे हकीकत यह है कि देश में व्यापारियों-उद्योगपतियों का कर्जा कभी माफ हुआ ही नहीं है। इसे सिर्फ बैंकों की बैलेंस शीट से हटा दिया जाता है। यह सब आरबीआई की गाइडलाइंस के तहत ही होता है। हालांकि सरकार बैंकों को एेसा करने के लिए प्रोत्साहित जरूर करती है।
वेबऑफ :न किसान चुकाते हैं, न बैंक वसूली करता है
नई सरकारें बनने के बाद मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा राजस्थान में किसानों को जिस राहत की घोषणा की गई है, वो वेवअॉफ ही है। यानी भविष्य में न कर्जदार बैंक को बकाया पैसा चुकाएगा, न ही बैंक इसकी वसूली के लिए किसी तरह के प्रयास करेगा। आमतौर पर एेसा किसानों के मामले में ही किया जाता रहा है। उस स्थिति में जब खराब मानसून, बाढ़, ओलावृष्टि या एेसी अन्य किसी आपदा के कारण फसलें बर्बाद हो गई हों। यह राहत फसलों यानी डायरेक्ट लोन के मामले में दी जाती है। इनडायरेक्ट मसलन कृषि से जुड़े उपकरण व ट्रैक्टर आदि पर नहीं। ताजा घोषणाएं भी इसी दायरे में हैं।
1). ऐसे मामलों में सरकारें चुकाती हैं यह पैसा
जितने भी कर्ज को वेवअॉफ किया गया है, उसे सरकारें ही बैंकों को चुकाती हैं। ताजा मामले में मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान की सरकारें अपने अपने राज्यों के किसानों के कर्ज की बकाया राशि बैंकों को देंगी। यानी बैंकों को नुकसान नहीं होगा। केंद्र या राज्य, जहां की भी सरकार इसे चुकाने जा रही है, उसे एक प्रक्रिया के तहत अपने बजट में से राशि जारी करनी पड़ती है। बजट न हो तो केंद्र सरकार बॉन्ड के जरिए आरबीआई से और राज्य सरकारें केंद्र से इस राशि की मांग करती हैं।
2). इन्हें फिर मिल सकता है लोन
जिन किसानों का लोन वेवअॉफ हुआ है, वे फिर से नए लोन के हदकार हैं। इसलिए कि वे डिफॉल्टर नहीं हैं, उनके एवज में कर्ज सरकार चुका रही है। बशर्ते उन्होंने राहत के लागू होने से पहले बैंकों का पैसा नियमित चुकाया हो।
3). न किसान चुकाते हैं, न बैंक वसूली करता है
नई सरकारें बनने के बाद मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ तथा राजस्थान में किसानों को जिस राहत की घोषणा की गई है, वो वेवअॉफ ही है। यानी भविष्य में न कर्जदार बैंक को बकाया पैसा चुकाएगा, न ही बैंक इसकी वसूली के लिए किसी तरह के प्रयास करेगा। आमतौर पर एेसा किसानों के मामले में ही किया जाता रहा है। उस स्थिति में जब खराब मानसून, बाढ़, ओलावृष्टि या एेसी अन्य किसी आपदा के कारण फसलें बर्बाद हो गई हों। यह राहत फसलों यानी डायरेक्ट लोन के मामले में दी जाती है। इनडायरेक्ट मसलन कृषि से जुड़े उपकरण व ट्रैक्टर आदि पर नहीं। ताजा घोषणाएं भी इसी दायरे में हैं।
राइट ऑफ:इनकी वसूली का बैंक करते रहते हैं प्रयास
इस साल अप्रैल में केंद्र सरकार ने संसद में बैंकों के 2.41 लाख करोड़ रुपए के फंसे हुए कर्ज (एनपीए) को बैलेंस शीट से बाहर कर दिए जाने का एेलान किया था। यानी राइटअॉफ कर देने (बट्टे खाते में डाल देने) का एेलान। बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व जनरल मैनेजर राजीव कुमार गुप्ता बताते हैं कि 'एेसा तब किया जाता है कि जब कर्ज की वसूली मुश्किल नजर आ रही हो। यह आमतौर पर व्यवसायियों व उद्योगपतियों के मामले में होता है। मगर लोन को राइटअॉफ कर देने के बाद भी बैंक डिफॉल्टर से वसूली का प्रयास करते रहते हैं। या किसी रिकवरी कंपनी को इसका जिम्मा दे देते हैं।'
1). इनकी वसूली का बैंक करते रहते हैं प्रयास
इस साल अप्रैल में केंद्र सरकार ने संसद में बैंकों के 2.41 लाख करोड़ रुपए के फंसे हुए कर्ज (एनपीए) को बैलेंस शीट से बाहर कर दिए जाने का एेलान किया था। यानी राइटअॉफ कर देने (बट्टे खाते में डाल देने) का एेलान। बैंक ऑफ इंडिया के पूर्व जनरल मैनेजर राजीव कुमार गुप्ता बताते हैं कि 'एेसा तब किया जाता है कि जब कर्ज की वसूली मुश्किल नजर आ रही हो। यह आमतौर पर व्यवसायियों व उद्योगपतियों के मामले में होता है। मगर लोन को राइटअॉफ कर देने के बाद भी बैंक डिफॉल्टर से वसूली का प्रयास करते रहते हैं। या किसी रिकवरी कंपनी को इसका जिम्मा दे देते हैं।'
2). यहां बैंक अपनी कमाई में से करते हैं भरपाई
लोन में जोखिम को देखते हुए आरबीआई ने प्रोविजन का नियम बनाया है। इसके तहत बिजनेस सेक्टर तथा कर्जदार की क्षमता को देखते हुए बैंक एक निश्चित राशि प्रॉफिट से अलग रख देते हैं। एनपीए के मामले में प्रोविजन कर्ज का 15 से 100% भी हो सकता है। लोन राइटअॉफ करने के लिए बैंक प्रोविजन की राशि खर्च में जोड़ लेते हैं। इससे उनका प्रॉफिट कम हो जाता है। वे सरकार को डिविडेंट नहीं दे पाते, उल्टा सरकार को रिकैपिटलाइजेशन के लिए इन्हें पैसा देना पड़ जाता है।
3). ये ब्लैक लिस्ट में हो जाते हैं शामिल
यह बकाया राशि बैंकों की लोन बुक से तो हट जाती है, पर वो देनदार बैंक के रिकॉर्ड में डिफॉल्टर बने रहते हैं। क्रेडिट इंफॉर्मेशन कंपनी (सिबिल) भी इस जानकारी को सभी बैंकों से साझा करती है। एेसे में डिफॉल्टर के लिए फिर लोन लेना मुश्किल हो जाता है।
सवाल जो बताते हैं कि लोन न चुकाने पर बैंकों के क्या-क्या हैं अधिकार
1). किसान पैसा न चुकाए तो क्या, उद्योगपति न चुकाए तो क्या?
किसानों के फसल लोन में सिक्योरिटी दो तरह की होती है। एक प्राइमरी यानी फसल, दूसरी कोलेटरल यानी भूमि, उस पर बने कुएं, बाउंड्री आदि। मगर कुछ चुनिंदा मामलों में ही बैंक किसानों से सिक्योरिटी बेचकर वसूली का प्रयास कर पाता है, क्योंकि यह आसान नहीं है। मगर व्यापारी या उद्योगपतियों के मामले में इनकी कंपनी या संस्था से जुड़े असेट्स, व्यक्तिगत संपत्ति आदि कुर्क की जा सकती है। एेसा विजय माल्या तथा नीरव मोदी के मामले में हो भी रहा है। वहीं इनके ऋण को राइटअॉफ करने के बाद बैंक सरफेसी कानून और डेब्ट रिकवरी ट्रिब्यूनल के माध्यम से भी कर्ज की वसूली करने का प्रयास करते हैं।
2). राइटअॉफ इसलिए भी जरूरी?
कई बार बैंक बड़ी मात्रा में कर्ज के फंसे होने के बाद अपने घाटे को छिपाने का प्रयास करते रहते हैं। एेसे में ये नए जरूरतमंदों को लोन भी नहीं देते। एेसे कर्ज को राइटअॉफ करने पर ही बैंकों को अपनी आय के स्रोतों की सही तस्वीर पता लगती है। इसके बाद ये नई शुरुआत कर सकते हैं।
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