फिल्मों पर पहले भी हुए हैं विवाद, रोचक यह कि जिसने विरोध किया अधिकतर उसकी ही बनी सरकार
स्पेशल डेस्क.संजय बारू की पूर्व प्रधानमंत्री डाॅ. मनमोहन सिंह पर लिखी किताब पर आधारित फिल्म द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर का ट्रेलर कांग्रेस और भाजपा के बीच विवाद का ताजा केंद्र है। 11 जनवरी को रिलीज होने वाली यह फिल्म डॉ. मनमोहन सिंह के 2004 से 2008 तक मीडिया सलाहकार रहे बारू के अनुभवों पर आधारित है।
2014 में इसी नाम से आई बारू की किताब में कहा गया था कि मनमोहन सिंह नाम के प्रधानमंत्री थे और सत्ता पर यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी का ही नियंत्रण था। इस फिल्म के ट्रेलर में इन्हीं बातों को प्रमुखता से पेश किया गया है। फिल्म का ट्रेलर आते ही भाजपा के आधिकारिक हैंडल से इसे ट्वीट किए जाने के बाद विवाद गहरा गया। कांग्रेस के नेता हमलावर हो उठे और फिल्म की रिलीज रोकने की मांग उठने लगी।
कांग्रेस शासित राज्यों में इसे बैन किए जाने की बात भी आई लेकिन बाद मेंं पार्टी की ओर से इसका खंडन कर दिया गया। बारू की किताब 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान ही आई थी। तब भी इसके समय को लेकर सवाल उठे थे, लेकिन मामले ने तूल नहीं पकड़ा। संभवतया इसकी बड़ी वजह मूल किताब का अंग्रेजी में होना और आम लोगों की राजनेताओं पर लिखी किताबों में कम दिलचस्पी होना रहा।
अब एक बार फिर चुनाव से ठीक पहले हिन्दी में आ रही इस फिल्म में आम लोगों की रुचि हो सकती है। फिल्म में गांधी परिवार को जिस तरह से पेश किया गया है, उससे पार्टी की चिंता बढ़ना लाजिमी है। तीन राज्यों में सत्ता गंवाने वाली भाजपा इसे मौके के तौर पर देख रही है। यह पहला मौका नहीं है जब किसी फिल्म पर राजनीतिक बवाल हुआ हो या जिन्हें प्रतिबंधित करने की मांग उठी हो।
इमरजेंसी पर बनी आंधी, इंदिरा गांधी पर बनी इंदु सरकार से लेकर दुनिया भर में कई फिल्मों को राजनीतिक विवाद के बाद विरोध या प्रतिबंध का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद रोचक यह है कि जिस पार्टी ने इन फिल्मों पर विरोध जताया बाद में अधिकतर उसकी ही सरकार बनी।
सेंसर बोर्ड ने फिल्म में लगाए कई कट
सेंसर बोर्ड ने द एक्सीडेंटल प्राइममिनिस्टर को यू सर्टीफिकेट दिया है। बारू की किताब और संबंधित रिसर्च मैटेरियल को देखकर बोर्ड ने इसे सर्टीफिकेट जारी किया। हालांकि, फिल्म में कुछ सीन कट किए गए हैं और कई जगह पर बीप का भी इस्तेमाल किया गया है। बोर्ड ने सर्टीफिकेट जारी करने से पहले न केवल काफी रिसर्च मांगी बल्कि कई सीन को लेकर निर्देशक से सवाल भी किए।
इस फिल्म के निर्देशक विजय रत्नाकर गुट्टे हैं। फिल्म की पटकथा मयंक तिवारी ने लिखी है। अनुपम खेर, अक्षय खन्ना और आहना कुमरा फिल्म में मुख्य भूमिका में हैं। इस फिल्म में मनमोहन व सोनिया के अलावा अटल बिहारी वाजपेयी, राहुल गांधी व लालू प्रसाद यादव के भी किरदार हैं। ऐसे में यह सवाल भी उठा है कि क्या इसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का किरदार भी देखने को मिलेगा।
यूट्यूब पर ट्रेलर हाइड होने पर भी हुआ विवाद
रिलीज होने से पहले ही फिल्म पर लगातार विवाद हो रहा है। यू ट्यूब द्वारा फिल्म के ट्रेलर को कथित तौर पर हाइड करने पर डॉ. मनमोहन सिंह की भूमिका निभा रहे अनुपम खेर ने आपत्ति व्यक्त की है। अनुपम ने ट्वीट करके यू ट्यूब से कहा कि उन्हें देश के कई हिस्सों से लोगों ने फोन व मैसेज करके बताया है कि सर्च में ट्रेलर ऑफ द एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर टाइप करने पर यह या तो दिख नहीं रहा है या 50वें स्थान पर नजर आ रहा है, जबकि हम पहले स्थान पर ट्रेंड कर रहे हैं।
कृपया मदद करें। हालांकि अब यह ट्रेलर यू ट्यूब पर उपलब्ध है। इस ट्रेलर को ही यू ट्यूब पर अब तक चार करोड़ से अधिक लोग देख चुके हैं। इतना ही नहीं इसे पसंद और नापसंद करने वाले लोगों के बीच ऑनलाइन बहस भी जारी हैं और तीखी राजनीतिक बहस हो रही है।
वोटर के रूप में सिनेमा देखने नहीं जाएंगे लोग : अनुपम खेर
फिल्म के बारे में अनुपम खेर का कहना है कि सिनेमाघरों में जो लोग इस फिल्म को देखने जाएंगे वे सिने प्रेमी होंगे। वे एक वोटर के रूप मेंं सिनेमाघर में प्रवेश नहीं करेंगे। लेकिन जब वे लौटेंगे तो उनके दिमाग में यह फिल्म जरूर होगी। सिनेमा और राजनीति को अलग नहीं किया जा सकता क्योंकि वे एक दूसरे का प्रतिबिम्ब हैं।
वह आगे कहते हैं कि एक कलाकार यह नहीं बता सकता कि कोई किसी दल को वोट क्यों दे रहा है। कुछ वोटर पार्टी के लिए समर्पित होते हैं, जबकि कुछ अच्छे और बुरे की लिस्ट बनाकर पार्टी या सरकार चुनते हैं। इसमें एक फिल्म कितना योगदान दे सकती है? वह आगे बताते हैं कि यह फिल्म एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मे एेसे व्यक्ति की कहानी है जो अपनी कुशलता से प्रधानमंत्री के पद तक पहुंचा।
आंधी, किस्सा कुर्सी का, कुत्तरापथिरिकल व इंदु सरकार का भी हुआ विरोध
- 1975 में बनी फिल्म आंधी को इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी के दौरान प्रतिबंधित कर दिया था। बाद में 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनने पर इसे रिलीज किया गया। लेकिन 1980 में इंदिरा फिर सत्ता में आ गईं।
- 1975 में जनता पार्टी के सांसद अमृत नाहटा द्वारा निर्देशित फिल्म किस्सा कुर्सी का के तो मास्टर प्रिंट सहित सभी कॉपियां इमरजेंसी के दौरान संजय गांधी के समर्थकों ने जला दी थीं। यह फिल्म इंदिरा गांधी व संजय गांधी की कार्यशैली को लेकर बनाई गई थी।
- इस फिल्म को नष्ट करने पर संजय गांधी व तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री विद्याचरण शुक्ला को सजा भी हुई। हालांकि बाद में यह फैसला रद्द हो गया। नाहटा ने 1978 में इस फिल्म को नए कलाकारों के साथ बनाया। लेकिन 1980 में कांग्रेस की फिर सत्ता में वापसी हो गई। बाद मेें खुद नाहटा कांग्रेस में शामिल हो गए।
- 1993 में राजीव गांधी की हत्या पर बनी फिल्म कुत्तरापथिरिकल को भी प्रतिबंध का सामना करना पड़ा। यह 2007 में रिलीज हो सकी। 2009 में कांग्रेस के नेतृत्व में दोबारा यूपीए सत्ता में आया।
- 2017 इमरजेंसी पर बनी इंदु सरकार का भी विरोध हुआ पर यह फिल्म 28 जुलाई 2017 को रिलीज हो गई। 2018 में कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव में तीन राज्यों में विजय हासिल की। लोकसभा के चुनाव इसी साल होने हैं।
इनके अलावा 1996 में महिलाओं में समलैंगिक संबधों पर बनी फिल्म फायर को हिन्दुवादी संगठनों के विरोध का सामना करना पड़ा। पहले ही दिन कई सिनेमा घरों में आग लगा दी गई। फिल्म को वापस सेंसर बोर्ड के पास भेजा गया, हालांकि वहां से बिना किसी काट-छांट के फिल्म को दोबारा हरी झंडी मिल गई।
गुजरात दंगों पर बनी फाइनल सोल्युशन, इंदिरा गांधी की हत्या पर बनी कौम दे हीरे के अतिरिक्त मोहल्ला अस्सी, केदारनाथ व पद्मावत सहित कई फिल्मों पर विरोध के बाद या तो प्रतिबंध लगा या काट-छांट के बाद रिलीज करना पड़ा।
'डॉ. साहब भीष्म जैसे लगते हैं, जिसमें कोई बुराई नहीं है'
फिल्म के 2.44 मिनट के ट्रेलर की शुरुआत मनमोहन सिंह की भूमिका निभा रहे अनुपम खेर से होती है। संजय बारू का किरदार अक्षय खन्ना निभा रहे हैं। ट्रेलर में कई डायलॉग ऐसे हैं, जो गांधी परिवार के खिलाफ दिख रहे हैं।
संजय बारू की भूमिका निभा रहे अक्षय खन्ना मनमोहन सिंह के बारे में बोलते हैं- 'मुझे तो डॉ. साहब भीष्म जैसे लगते हैं, जिनमें कोई बुराई नहीं है। पर फैमिली ड्रामा के विक्टिम हो गए। महाभारत में दो फैमिलीज थीं, इंडिया में तो एक ही है।' हालांकि, आज किसी फिल्म को किसी राज्य में प्रतिबंधित करना कोई मायने नहीं रखता। लोगों के पास फिल्मों को देखने के कई विकल्प उपलब्ध हैं।
आगे क्या : भाजपा को सिर्फ टॉकिंग प्वाइंट मिलेगा: एन.के. सिंह
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक एन.के. सिंह का कहना है कि इस फिल्म से भाजपा को दो-चार दिन के लिए एक टॉकिंग प्वाइंट जरूर मिल जाएगा, लेकिन इसका कोई लाभ नहीं होता है। यह वैसा ही है जैसे कांग्रेस भाजपा सरकार पर आरोप लगाती है कि उसे आरएसएस संचालित कर रहा है।
सच यह भी है कि 2004 व 2009 में कांग्रेस को वोट सोनिया के चेहरे पर ही मिले थे न कि मनमोहन सिंह के। इसलिए उनके सरकार में दखल पर किसी को आश्चर्य नहीं होता है। यह सोनिया गांधी की ही क्षमता थी कि भाजपा द्वारा तमाम धार्मिक मुद्दों को हवा देने के बावजूद कांग्रेस लगातार दस साल जीतती रही और मनमोहन अपना कार्य करते रहे।
विकास के तमाम पैरामीटर्स खासकर किसानों की आय, रोजगार के अवसर आज की सरकार से बेहतर होते रहे। अगले चुनाव में तो भाजपा सरकार की परफॉर्मेंस ही काम आएगी। कांग्रेस की नाकामियां गिना कर भाजपा 2014 में ही सत्ता हासिल कर चुकी है। अब तो जवाब भाजपा को ही देना है। जहां तक मनमोहन सिंह का सवाल है तो वैसे भी भारतीय जनमानस की एक खास बात है दीर्घकालिक जन-स्वीकार्यता, जो भीष्म पितामह को हासिल हुई।
इसके बावजूद इतिहास कमजोर भीष्म नहीं चाहता। अगर मनमोहन को भीष्म बनना था तो प्रेस कांफ्रेंस में राहुल गांधी द्वारा उनके अध्यादेश की प्रति फाड़ने पर तत्काल इस्तीफा देना (मात्र सोचना नहीं) था। अपने समर्पण की मजबूरी को सैद्धांतिक जामा पहनाने के लिए ही भीष्म ने 'सिंहासन से बंधे रहने की मजबूरी' बताया था। इसीलिए सोनिया गांधी के प्रति पूर्ण समर्पण को अकाट्य सैद्धांतिक जामा पहनाना संजय बारू के लिए जरूरी था।
फिल्म के खिलाफ कोर्ट में शिकायत, सुनवाई 8 को
बिहार के मुजफ्फरपुर में एक अधिवक्ता सुधीर कुमार ओझा ने अनुपम खेर व अक्षय खन्ना समेत फिल्म की टीम के 18 लोगों के खिलाफ कोर्ट में शिकायत दर्ज कराई है। शिकायत में कहा गया है कि फिल्म के माध्यम से पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का अपमान किया गया है।
और वह इस फिल्म के प्रोमो देखकर आहत हैं। इस शिकायत पर 8 जनवरी को सुनवाई होनी है। किसी भी किताब पर फिल्म बनाने के लिए कुछ कानूनी औपचारिकताओं के बाद ही असली नामों का इस्तेमाल किया जा सकता है। उधर, महाराष्ट्र यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष सत्यजीत तांबे पाटिल ने फिल्म के निर्माता को पत्र लिखकर इसे रिलीज करने से पहले उन्हें दिखाने की मांग की है। उन्होंने फिल्म में तथ्यों को गलत तरीके से पेश करने का आरोप लगाया है।
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